दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से राज मिस्त्री कालू से हुई। राज मिस्त्री कालू कहते है कि वो ठेकेदार के माध्यम से काम करते है और उन्हें कोई सुविधा नहीं मिलती है। रोजाना कार्य नहीं हो रहा ,कभी काम मिलता है तो कभी नहीं मिलता है। ठेकेदार की तरफ से 500 रूपए दिहाड़ी मिलती है जो कभी सप्ताह में दिया जाता है तो कभी 15 दिनों में मिलता है। ठेकेदार के ओर से काम करने जाते है तो उन्हें कार्यक्षेत्र में हेलमेट ,जूते दिए जाते है। लेकिन जब बड़ी कंपनियों के लिए काम करने जाते है तो वहाँ कार्यक्षेत्र में एम्बुलेंस आदि की व्यवस्था नहीं रहती है। कालू जी राजस्थान के मूल निवासी है ,गाँव म उन्हें एक दो महीने में काम मिलता है ,अच्छे काम की तलाश में ही नगर की ओर आये है

दिल्ली के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बरेली निवासी पप्पू लाल से हुई। पप्पू बताते है कि दिहाड़ी का कार्य सही नहीं चल रहा है। रोजाना कार्य नहीं मिलता है। कभी पाँच सौ तो कभी चार सौ रूपए दिहाड़ी मिलती है। गाँव में काम नहीं मिलता है इसलिए शहर आते है काम के लिए। चौक से ही काम पर जाते है या दिर ठेकेदार के माध्यम से काम करते है। ठेकेदार वैसे काम के पैसे महीने में देते है लेकिन कभी ठेकेदार पैसा देते है तो कभी नहीं देते है। भवन निर्माण का कार्य करने जाते है तो उन्हें सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं मिलती है। कोरोना काल में काम की स्थिति सही नहीं है। राशन पानी,रूम किराया की भी समस्या होती है।

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दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम से नन्द किशोर और इनके साथ एक राज मिस्त्री का कार्य करने वाले गोपाल कुमार हैं वे साझा मंच के माध्यम से कहते हैं कि इन्हे कभी काम मिलता है तो कभी बेरोजगार रहना पड़ता है। साथ ही काम पर ठेकेदार के द्वारा ले जाया जाता है पर समय से वेतन नहीं मिल पाता है।यदि इसके विरोध में जाते हैं तो ठेकेदार वेतन देने से मना कर देते हैं

दिल्ली के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से शिव शंकर से हुई। शिव शंकर कहते है कि काम बहुत ही मंदा चल रहा है। महीने में 15 दिन ही काम मिल पाता है। कभी प्रदुषण तो कभी लॉक डाउन आड़ा आ जाती है। 400 रूपए दिहाड़ी रहती है परन्तु काम करवा कर 300 रूपए ही देते है।प्रशासन से मदद लेने पर वो भी सुनवाई नहीं करते है ,गाँव वालों से डरते है।कार्यक्षेत्र में ईंट उठाने का काम दिया जाता है तो कभी ऐसे काम दिया जाता था जिससे वो कर नहीं पाते थे। कार्यक्षेत्र में सुरक्षा के साधन भी नहीं मिलते है ये पहले हॉटीकल्चर का कार्य करते थे माली डिपार्ट का ,जिसमे उनको 15 हज़ार रूपए मिलते थे। लॉक डाउन में काम से निकाल दिया ,जिसके बाद से दिहाड़ी में श्रमिक का काम करते है। इनके साथ इनके परिवार भी बाहर जा कर कार्टन में स्टीकर चिपकने का काम करते है ,जिसके उन्हें 5400 रूपए वेतन मिलते है। इससे गुज़ारा करना बहुत मुश्किल है। दूसरा कारण कि जनसंख्या बढ़ी हुई है ,पहले तो लेबर चौक में दिहाड़ी मिल जाती थी लेकिन अब नहीं मिलती है। बिहार में भी काम करना मुश्किल है क्योंकि वहां रेट कम मिलता है ,इसलिए लोग नगरों की ओर आना पसंद करते है। सरकार से आज तक कोई सहायता नहीं मिली ,बिहार से लेबर कार्ड भी नहीं बना।

दिल्ली के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से दिहाड़ी श्रमिक अजय से हुई। अजय बताते है कि वो निर्माण क्षेत्र में दिहाड़ी का कार्य करर्ते है। उनके पास ईंट पत्थर ,खुदाई ,मिट्टी आदि का काम आता है। यह काम कई वर्षो से काम कर रहे है। अभी काम की स्थिति बहुत ख़राब है। यहीं काम गाँव में कम मिलता है,इसलिए दिल्ली चले आये। यह काम के लिए 400 रूपए दिहाड़ी है कभी कभार घटा कर भी दिया जाता है। मज़बूरन भय से वो कम पैसे ही लेकर चले जाते है। कार्यक्षेत्र में खतरे वाले काम में सुरक्षा के उपकरण नहीं मिलता है। कंपनी में डॉक्टर एम्बुलेंस की सुविधा भी नहीं मिलता है। इनके साथ परिवार भी काम करते है तभी ही गुज़ारा हो पाता है। यह काम परमानेंट नहीं मिलता है। आज तक सरकार से सहायता नहीं मिली। इन्होने ई श्रम कार्ड बनवाये जिसके इन्होने 250 रूपए दिए

दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से भवन निर्माण श्रमिक प्रकाश से हुई। प्रकाश बताते है कि अभी काम बहुत मुश्किल से चल रहा है। 15-20 दिनों से बैठे हुए थे आज जा कर काम मिला। चौक से जाते है काम पर ,कभी मिलता है तो कभी नहीं मिलता है। कोरोना काल के कारण काम मंदा है। श्रमिक का दिहाड़ी 600 रूपए है ,कभी कभार मालिक द्वारा कम पैसे दिए जाते है जिससे संतुष्ट होना पड़ता है। अगर गाँव में काम मिल जाता तो नगर आने की जरूरत नहीं पड़ती। कार्यक्षेत्र में ख़तरों वाले कार्य के लिए सुरक्षा उपकरण मिल जाते है

दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से फेरीवाले बबलू से हुई। बबलू कहते है कि इस वक़्त फेरी वाला का काम ही उन्हें सबसे सही लगता है। अभी ऐसा समय आ गया है कि महँगाई बढ़ गई है और काम कम हो गई है। इसलिए सही से कमाई नहीं हो पाती है। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी साक्षात्कार...

दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम रोड से नन्द किशोर की बातचीत साझा मोबाइल वाणी के माध्यम से एक श्रमिक विनोद से हुई। विनोद कहते है कि अभी दो माह से काम नहीं मिल रहा है। सुबह से शाम लेबर चौक में खड़े रहते है ,एक दो दिन मिल जाता है तो मिल जाता है। कभी कभी कंपनी वाले भी काम के लिए आते है लेकिन रेट कम देते है। विरोध करने पर भी सही रेट नहीं देते है। कंपनी में सुरक्षा के उपकरण नहीं मिलती है। किसी ही कंपनी में हेलमेट वगेरा मिल जाते है। एम्बुलेंस ,सुरक्षा की व्यवस्था नहीं मिलती है। हादसे होने का डर है। काम की बहुत कमी हो गई है। लोग गाँव से आ रहे है ,वो काम का इंतज़ार कर रहे है ,इधर उधर काम के लिए भटक रहे है। कोरोना को लेकर रविवार और शनिवार लॉक डाउन है ,इससे काम में बहुत असर पड़ा है। दो वर्षों से काम की स्थिति सही नहीं है। अगर काम नहीं मिलेगा तो वापस घर चले जाएगी। काम को लेकर कई तबके के लोग परेशान है

उत्तरप्रदेश के गुरुग्राम से नंदकिशोर ने वहां के लोगों से बात की। मजदुर ने बताया कि कोरोना के कारण सभी ऑफिस में कर्मचारियों की छंटनी हो गयी है। इससे काम नहीं मिल रहा है। पिछले पैसा भी नहीं मिला है