उत्तराखंड से रोहित राणा ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि वो दृष्टिहीन व्यक्ति है ,गुजरात में कंपनी काम करते थे जिसमे उन्हें महीने के 5000 रूपए मिलते थे । लॉक डाउन में तीन महीना रहे फिर मुश्किल से वापस घर आए। वहाँ बहुत समस्या होती थी ,खाने की बहुत समस्या होती थी। गाँव आने के बाद उन्हें कोई क्वारंटाइन में भी नहीं रख रहे थे। लॉक डाउन की यादों से उनका मन उदास हो जाता है।

दिल्ली एनसीआर के मानेसर के खो गाँव से शंकर पाल ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि महँगाई से बहुत परेशानी हो रही है। उज्वला गैस तो मुफ्त में मिला परन्तु गैस रिफिल में बढ़ते महँगाई से सब परेशान है। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी ख़बर...

दिल्ली एनसीआर के मानेसर के खो गाँव से शंकर पाल ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि कोरोना के बढ़ते मामले को देखकर श्रमिकों घबरा रहे है। लॉक डाउन के डर से श्रमिक वापस पलायन कर रहे है

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दिल्ली के गुरुग्राम हरियाणा से नन्द किशोर परशाद ने साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कंपनियों में काम करने वाले श्रमिक वासुदेव जी से दोबारा बढ़ रहे कोरोना काल एवं बढ़ती परेशानियों पर चर्चा कर रहे हैं

दिल्ली के हरियाणा बहादुरगढ़ से शत्रोहन लाल कश्यप ने साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बीरेंद्र जी से काम के सिलसिले में बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि लॉक डाउन के पहले वे नौकरी करते थे लेकिन लॉक डाउन के बाद उन्होंने खिलौने बेचने का कारोबार करने लगे। साथ ही वे बता रहे हैं कि होली त्यौहार के बाद रोजगार में और भी ज्यादा गिरावट आ गयी है। अगर यही स्थिति बनी रही तो खिलौने बेचने का कारोबार छोड़ कर कपडेका व्यवसाय करना पड़ेगा ।

उत्तर प्रदेश के रामपुर शहर से कपड़े सिलने वाले मजदूर काम करने गए मुंबई वहां पर है बहुत बुरा हाल काम नहीं मिल रहा है आने के पैसे भी नहीं है तालिब रजा से हुई हमारी बातचीत लॉकडाउन से पहले सात-आठ ₹कमा लेते थे अब तो एक पेंट भी नहीं मिलती सिलने के लिए जिसकी सिलाई मजदूरी 150 सो रुपए होती है मुंबई में दफा 144 लगा दी गई है नाईट कर्फ्यू लगा दिया गया हैअब दिन में भी मार्केट बंद होने लगी है अब तो मजदूरों को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है सरकार को इन मजदूरों पर ध्यान देना चाहिए

तमिलनाडु राज्य के तिरुपुर ज़िला से मीना कुमारी ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि श्रमिक जब दूसरे कंपनी में काम की तलाश में जा रहे थे तब एक ठेकेदार ने उन्हें अपनी कंपनी में काम दिलवाने का भरोसा दिया। परन्तु जब श्रमिक काम के लिए कंपनी पहुँचे तो उन्हें कहा जाता है कि काम नहीं है ,अब कल आना। ऐसे में श्रमिकों को जीविका चलाने में बहुत दिक्क़ते आ रही है। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें जानकारी..

"लॉकडाउन का एक साल; हम श्रमिकों को रहेगा याद" कार्यक्रम की नयी कड़ी- "लॉकडाउन की तस्वीरें" में आप सभी का स्वागत है। साथियों, दरअसल इन तस्वीरों के जरिए हम आपको कोरोना-संक्रमण के कारण हुए लॉकडाउन में पैदा हुए भयावह हालातों से एक बार फिर रूबरू कराना चाहते हैं। उस लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों की बदहाली और दुर्दशा का मंजर भला कौन भूल सकता है! अचानक दिए गए एक आदेश के बाद जब सबकुछ एक झटके में ठहर गया, तब विभिन्न राज्यों और शहरों में मेहनत-मजदूरी कर अपनी आजीविका चला रहे लाखों-करोड़ों प्रवासी श्रमिक ऑटो, मोटरसाइकिल, रिक्शा और जिनके पास कोई साधन नहीं था, वे पैदल ही हजारों मील की दूरी भूखे-प्यासे, नंगे पावों से नापने का जज़्बा लिए अपने-अपने घरों को निकल पड़े। उन कठिन परिस्थितियों में शुरू की गयी इन दुर्गम यात्राओं के दौरान भूख-प्यास और बीमारी के कारण कई लोग बीच रास्ते में ही असमय काल-कवलित भी हो गए। मज़दूरों को याद कर आज भी रात-रात भर नींद नहीं आती। इस वैश्विक आपदा के कारण उत्पन्न हुई परिस्थितियों में घटी इन भयावह घटनाओं को भला हम कैसे भुला सकते हैं? साथियों, क्या आपको ऐसा लगता है कि इस महामारी के बाद प्रवासी मजदूरों पर आए इस भीषण संकट के बाद भी क्या हमारा देश कोई सबक सीख पाया है? क्या आपको इस गुजरे वर्ष में मज़दूरों की स्थिति में कोई बदलाव दिखलायी दे रहा है? इस लॉकडाउन की सबसे अधिक मार उन प्रवासी मजदूरों पर पड़ी, जो अपना घर-परिवार छोड़कर बड़े शहरों में अपना और अपने परिवार के बेहतर भविष्य की उम्मीदों के साथ काम करने आए थे। लेकिन अचानक हुए लॉकडाउन के चलते बिना किसी सुविधा के, तमाम कठिनाइयों को झेलते हुए उन्हें अपने घर लौटने को मजबूर होना पड़ा। कोरोना-संक्रमण के चलते हुए सम्पूर्ण लॉकडाउन ने कारोबार चौपट करने के साथ ही मानव-सभ्यता के इतिहास में भी काले अध्याय के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस वैश्विक महामारी से उपजे दुष्कर हालात में भारत ने आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन देखा। इस आपदा के एक साल गुजरने और परिस्थितियों के थोड़ा सामान्य होने पर हमारे श्रमिक साथी काम की तलाश में एक बार फिर उन्हीं फैक्ट्रियों-कारखानों में लौट आए हैं या लौट रहे हैं, जिन्होंने उस आपदा के दौरान उनकी कोई भी मदद करने से इनकार करते हुए, उन्हें उनके हालात पर संघर्ष करने को छोड़ दिया। लेकिन अपने हालातों से किये गए इन तमाम समझौतों के बाद भी उनकी परेशानियां हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं और साथ ही हमारे श्रमिक साथी आज भी नहीं भूल पा रहे उन गुजरे दिनों के दौरान अपने ऊपर गुजरी उन मुसीबतों को। साथियों, आप भी हमें बताएं कि इस गुजरे साल के बाद भी क्या प्रवासी श्रमिकों की जिंदगी अब दुबारा पटरी पर लौट गयी है? लॉकडाउन के दौरान आपके साथ गुजरी अच्छी-बुरी घटनाओं और यादों को हमारे साथ जरूर साझा करें

नमस्कार आदाब साथियों, अभी लॉकडाउन के एक साल पूरे हो गए हैं और इस बीते एक साल के दौरान हम मज़दूरों ने जिस तरह की मुसीबतें झेलीं हैं, विश्व-इतिहास में वैसा कोई दूसरा उदाहरण हमें नहीं मिलता। शहरों ने तो वैसे भी हमें कभी अपना नहीं माना था, लेकिन हमारे अपने गाँव में भी हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं मिला। फिर भी हम बिना हार माने लगातार अपने जीवन का संघर्ष करते रहे। फिर स्थितियां थोड़ी सामान्य होने पर जब हम मजदूर काम की तलाश में उम्मीदों की डोर पकड़े एक बार फिर शहर आये, तो फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों की नौकरियां चली गईं, अधिकांश कंपनियों ने उस दौरान न सिर्फ सैलरी काट ली, बल्कि मज़दूरों को नौकरी से भी बाहर कर दिया। और तो और, अधिकांश श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने वाला विधेयक भी इसी लॉकडाउन के दौरान ही पारित किया गया था। इस कोरोनाकाल के दौरान सरकारी-कार्यप्रणाली की अक्षमता को उजागर करती हुई ऐसी लाखों कहानियां हमारे पास हैं। तो श्रोताओं, यदि आप भी एक श्रमिक हैं और लॉकडाउन के दौरान इस तरह के अनुभवों से आपका भी सामना हुआ है तो इस दौरान आपने क्या देखा और महसूस किया? आपके द्वारा रिकॉर्ड की गयी बातों को हम इस कार्यक्रम में जरूर शामिल करेंगे। तो आने वाले सोमवार, यानि 29 मार्च से शाम 5 बजे हम आपके लिए लेकर आ रहे हैं एक नया कार्यक्रम, जिसका नाम है- "लॉकडाउन का एक साल, हम श्रमिकों को रहेगा याद"।



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