उत्तराखंड से हमारे श्रोता साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बता रहे है कि सरकार की ओर से मनरेगा के तहत मिलने वाले पैसे का ठेकेदार गबन करते हैं ठेकेदार

वैसे तो देश में पूर्ण लॉकडाउन नहीं लगा है पर जिस तरह के हालात बने हुए हैं उनमें अधिकांश कारखाने बंद हैं. बहुत से दुकानदार कर्फ्यू के डर से दुकानें नहीं खोल रहे हैं. ये वही हालात हैं जो अब से कुछ माह पहले भी बनें थे. जब छोटे-छोटे बच्चों को कंधे पर बैठाएं लोग, बूढ़े मां-बाप को सहारा देकर पैदल या साइकिलों पर सवार किए हुए, अपने घरों की तरफ लौटती भीड़ को हम सबने देखा था. साथियों, हम ये बाते कर रहे हैं क्योंकि लॉकडाउन के पूरे एक साल बीत चुके हैं. उन्ही हालातों को समझने के लिए हम लेकर आए हैं अपना कार्यक्रम लॉक डाउन का एक साल- हम श्रमिकों को रहेगा याद की तीसरी कड़ी यानि काम पर वापसी. श्रोताओं, जब शहरों से लोग गांव पहुंचे थे तो उन्हें उम्मीद थी कि गांव में कुछ ना कुछ रोजगार मिल जाएगा पर उन्हे ना तो मनरेगा में काम मिला ना वे अपना व्यवसाय शुरू कर पाए. जो जमापूंजी थी वो भी खत्म होने लगी. जब कोई रास्ता नहीं मिला तो लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना फिर से शहरों की तरफ रूख किया. कुछ कंपनियां और कारखाने खुले तो उन्होंने मजदूरों को कम संख्या में ही सही पर काम पर बुला लिया और कुछ ने साफ इंकार कर दिया. जो मजदूर काम पर लौटे हैं वे पहले से भी बदत्तर हालात में हैं. जिन राज्य सरकारों ने प्रवासी मजदूरों को उनकी कुशलता के आधार पर काम देने का वायदा किया था वे पूरे नहीं हुए. साथियों,बहुत से श्रमिक भाईयों के साथ ये हालात बन गए कि उन्हें परिवार का भरण पोषण करने के लिए महंगे ब्याज पर कर्ज लेने की नौबत आ गई. जो कभी औरों को काम दिया करते थे वे अब खुद काम की तलाश में हैं. हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या आपको नहीं लगता कि राज्य सरकारों ने प्रवासी मजदूरों का बस इस्तेमाल किया? मजदूरों को रोजगार देने, कम दाम पर घर और अनाज देने का जो वायदा किया गया था वो उनके साथ एक और धोखा था? हम आपसे आपकी परिस्थितियों के बारे में जानना चाहते हैं. हमें बताएं कि दोबारा शहर लौटकर आप किन मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.

बिहार राज्य से रवि साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कह रहे है कि देश में एक बार फिरसे लॉक डाउन की स्थिति बन रही है ऐसे में सभी मजदूर ओपन अपने घर पहुँच रहे है जिनको मनरेगा के द्वारा काम देना मुखिया का फ़र्ज़ है। साथ ही कह रहे है कि उन्हें एक ऐसा मुखिया की जरूरत है जो अपने गाँव में ही गाँव के मजदूरों को काम दिलवा सके। कह मनरेगा के द्वारा यदि गाँव में ही मजदूरों को काम मिलेगा तो मजदूर वर्ग के लोग गाँव चोर कर सहर की और नहीं जाएंगे

आईएमटी मानेसर से दीपक साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बता रहे है कि किश तरह मजदूर मनरेगा में काम पा सकते है तथा इसके लिए उन्हें क्या करना चाहिए

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उत्तराखंड से हमारे श्रोता सत्यम सिंह साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बता रहे है कि उन्हें मोबाइल वाणी पर चल रहा कार्यक्रम 'मेरा मुखिया कैसा हो' सुन कर बहुत अच्छा लगा। साथ ही कह रहे है कि उनके गाँव में मनरेगा के तहत 6 दिन का काम करने का अवसर प्राप्त हुआ है

असल में कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 में लागू किये गए लॉकडाउन का सबसे बुरा प्रभाव प्रवासी मजदूरों पर पड़ा। रोज कमाकर अपना पेट पालने वाले इन मजदूरों को लॉकडाउन की घोषणा के बाद संभलने का मौका ही नहीं मिला। वो जिन ठेकेदारों, कंपनियों, दफ्तरों और लोगों के सहारे थे उन सबने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया था। बीमारी की दहशत, काम बंदी, भुखमरी का डर और लॉकडाउन के शुरुआत में पुलिस की सख्ती के चलते प्रवासी मजदूरों के सामने ऐसे हालात पैदा हो गए कि उन्हें हजारों किलोमीटर दूर पैदल सफर कर अपने गांव लौटना पडा। पैदल मीलों लंबा सफर तय करने में इन मजदूरों को महीनों लग गए, कई मुश्किलों का सामना करते हुए वे अपने गांव पहुंचे. कई तो ऐसे भी थे जिनका सफर अधूरा ही रह गया. बहुत से मजदूर सडक हादसों का शिकार हुए और कुछ को मौसम की मार और बीमारी ने मार डाला. हालांकि मजदूरों के दर्द को सुप्रीम कोर्ट ने समझा और आदेश दिया कि 15 दिन के अंदर सभी राज्यों से प्रवासियों की सुरक्षित वापसी कराई जाए। यह कदम तत्काल उठाया गया लेकिन जैसे तैसे अपने घर पहुंचे मजदूरों को उनके ही अपनों ने दुत्कार दिया. संक्रमण के डर से मजदूरों को गांव के बाहर ही प्रवास करने पर मजबूर किया गया. इसके बाद मजदूरों को काम देने के लिए केन्द्र सरकार ने मनरेगा के फंड में इजाफा किया. पर जब मुख्य बजट की बात आई तो मनरेगा के नाम पर सरकार ने हाथ खडे कर लिए. गांव में काम नहीं होने के कारण जो मजदूर दोबारा शहर आए थे उन्हें यहां भी काम नहीं मिल रहा है. ऐसे में वे दोबारा गांव की ओर पलायन कर रहे हैं. हम आपसे जानना चाहते हैं कि सरकार ने मनरेगा के फंड में कटौती कर मजदूरों के साथ छल किया है? क्या आपको नहीं लगता कि सरकार के इस फैसले से मजदूरों के हालात बदत्तर हो रहे हैं? लॉकडाउन के बाद आई बेरोजगारी से मजदूर साथी कैसे निपट रहे हैं?

साथियों , ग्राम पंचायतों में विकास कार्य की जिम्मेदारी प्रधान और पंचों की होती है। इसके लिए हर पांच साल में ग्राम प्रधान का चुनाव होता है. क्योकि अगर पंचायत स्तर पर काम होगा तो देश आगे बढ़ेगा। दोस्तों, आप हमें बताएं कि क्या आपकी पंचायत में मुखिया या प्रधान द्वारा कौन कौन से कार्य किये जाते है ? या आपके गांव में प्रधान की तरफ से कौन—कौन से काम किए जा रहे हैं? क्या आप जानते हैं कि ग्राम प्रधान की जिम्मेदारी क्या होती है?साथही आप अपने किन कामों के लिए ग्राम प्रधान पर निर्भर हैं ? औरक्या ग्राम प्रधान की ओर से आपको सूचित किया गया है कि वे गांव के किन कामों के लिए उत्तरदायी हैं?

दिल्ली से हस्मत अली और इनके साथ रफीक अहमद है वे साझा मंच के माध्यम से कहते हैं कि मेरा मुखिया साफ छवि का होना चाहिए, जो जनता के हित के लिए काम करे। सरकार द्वारा जो भी योजना निकाली जाती है उसका लाभ जनता को दिलाए।कुछ दिन पूर्व जब लॉकडाउन था तो सरकार द्वारा मनरेगा के तहत मजदूरों को रोजगार दिलाने का निर्देश जारी किया गया था। लेकिन मुखिया ने किसी भी प्रवासी मजदुर को रोगजार दिलाने में मदद नहीं की

साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से रफ़ी ने उत्तर प्रदेश के चित्रकूट निवासी एक मज़दूर साथी से बातचीत कर रहे हैं। इस बातचीत में मजदुर साथी ने बताया कि इनके गाँव मेंचुनाव जीतने के लिए कई प्रत्याशी खड़े हुए हैं और जनता के बीच जा कर वोट मांगने का कार्य कर रहे हैं।साथ ही कई बड़े बड़े वेड भी करते हैं जैसे- नाली निर्माण करवाने का,पानी की सुविधा,सड़क निर्माण, कलोनी पास करवाने की बात करते हैं। पर हक़ीक़त तो तब सामने आती है जब जनता अपनी कीमती वोट मुखिया को दे कर जीत का माला पहनाती है और मुखिया सभी वादों को भूल खर अपनी शान दिखाने में रह जाते हैं



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