आज हम बात करेंगे उन मजदूर श्रमिकों की जो काम की तलाश में बीते कई महीनों से इधर उधर भटक रहे हैं, हम बात उनकी भी करेंगे जिन्हें काम से निकाल दिया गया है। लॉकडाउन के चलते इन कंपनियों ने घाटे का हवाला देते हुए मजबूरों की संख्या कम कर दी, उनकी तनख्वाह घटा दी। कुछ कम्पनियों ने तो अपने मजदूरों की संख्‍या इसलिए भी घटा दी ताकि कम मजदूरों से ज़्यादा उत्पादन करवाया जा सके। कई कंपनियां तो ऐसी भी थीं जिन्‍होंने कर्मचारियों को अनिश्चितकालीन छुट्टी पर भेज दिया यानि उन्हें बिना बताये काम से निकाल दिया. ऐसे हालातों में मजदूरों के मन में अपने भविष्य को लेकर निराशा के कई सवाल उठ रहे हैं? लाखों की संख्या में मजदूर पलायन करके अपने गांव आ गए हैं क्योंकि जिस शहर में वो वर्षों से मजदूरी करके गुजारा कर रहे थे आज उस शहर में सन्नाटा पसरा है। देश में कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचा दी है, महाराष्ट्र जैसे राज्य में मिनी लॉक डाउन लग चुका है, वहां से पलायन शुरू हो गया है। ऐसी आशंका जताई जा रही है अगर जल्द ही हालात कण्ट्रोल में नहीं हुए तो पूरे देश में फिर से लॉकडाउन लग सकता है।मजदूर इस भय से जी रहे हैं कि अगर दोबारा लॉकडाउन लग गया तो वो फिर खाने को मजबूर हो जाएंगे। पिछले वर्ष लॉक डाउन की स्थिति में सरकार ने दावा किया था कि किसी भी कर्मचारियों के वेतन की कौटती नहीं की जाएगी, कर्मचारियों की छटनी नहीं होगी, नौकरी से नहीं निकाला जाएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कंपनियों ने लगातार श्रमिकों की छटनी की और अभी भी कर रही है। श्रमिक वर्ग अभी भी काम की तलाश में भटक रहे हैं। साथियों,तो हम आपसे जानना चाहते हैं कि सरकार ने जो बड़े बड़े वादे किए थे क्या उसका लाभ आपको मिला? सरकार के दावों की धरातल पर क्या स्थिति है? आप मुझे अपने या अपने आसपास की जमीनी सच्चाई बताएं जिससे हम जान सकें कि बड़े- बड़े वायदों की सच्चाई क्या है?आप हमें बताएं कि लॉकडाउन ने, आपके काम को किस प्रकार प्रभावित किया है ? पिछले एक वर्ष में आपके काम में किस प्रकार के बदलाव हुए हैं? क्या आपकी कम्पनी में कोरोना महामारी के कारण श्रमिकों की छटनी हुई है? अगर हाँ, तो आपने इसके लिए क्या प्रयास किये? इन सभी सवालों पर अपने विचार अपने फोन में नंम्बर तीन दबाकर ज़रूर रिकॉर्ड करें।

दिल्ली से संवाददाता रफ़ी की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से आया नगर निवासी राम करण से हुई। राम करण बताते हैं कि वे दिल्ली के आया नगर में रहते थे और गुडगांवा में काम करते थे। जब कम्पनी छोटी-छोटी गलती पर काम से निकाल दिया करती थी तो अपने हक़ को पाने के लिए स्वयं आवाज उठाते थे। लेकिन जब कोर्ट में जाते थे तो वहां कोई सुनवाई नहीं होता था। यदि कोई श्रमिक जागरूक होते हैं तो वे किसी वकील से या संस्था से जुड़े व्यक्ति से अपनी समस्या साझा करते हैं और उनकी राय लेते हैं।और जो भी जानकारी उन्हें मिलती है उसके अनुसार ही अपना काम करते हैं लेकिन दूसरी ओर जो श्रमिक जागरूक नहीं होते हैं वे सीधे लेबर कॉर्ड में जा कर अपना समय बरबाद करते हैं। साथ ही जब श्रमिकों को तारीख़ मिलने पर वे कोर्ट जाते हैं तो एक दिन का काम छूट जाता है और दिहाड़ी भी उन्हें नहीं मिल पाता है। कम्पनी को जब यह खबर मिलती है की श्रमिक कोर्ट का चक्क्र लगा रहे हैं तो कम्पनी श्रमिक को काम पर नहीं रखती है। यह सोच कर की ये तो यूनियन का आदमी है। जबकि मजदुर अपने हक़ और इंसाफ को पाने के लिए लेबर कोर्ट का चक्क्र लगाते हैं। वहीँ श्रमिक किसी यूनियन के माध्यम से मुकदमा दर्ज करती है तो उन्हें 5 या 10% खर्चे के रूप में पैसे देने पड़ते हैं और वकील से जुड़ कर करते हैं तो 10% खर्चा लिया जाता है।साथ ही जब श्रमिक साझा मंच की सहायता से कोई कार्य को करती है तो निःशुल्क कार्य हो जाता है। यदि कोर्ट की करवाई आसान करने के लिए ऐसी कोई व्यवस्था को लागु की जाए जहाँ मामले को ऑनलाइन लॉगिन करके सुनवाई की तारीख मिल जाए या आदेश प्राप्त कर ली जाए। साथ ही अदालत की करवाई को ऑनलाइन श्रमिक देख सकें ऐसी सुविधा आ जाए तो श्रमिकों को काफी लाभ मिलेगा उनका समय बचेगा साथ ही उस दिन की मजदूरी भी नहीं कटेगा। क्योंकि कोई भी ऐसी कम्पनी अबतक सामने नहीं आई है जो मजदूरों के हित के लिए सोचे उनकी सहायता करे। यदि मोबाइल वाणी मजदूरों की सहायता और उनकी समस्या को सरल बनाने के लिए कोई एप्प जारी करती है तो उसमे यह सिस्टम अवश्य दिया जाए जैसे मजदूरों को किस तारीख में अदालत पहुंचना है,कोर्ट के क्या आदेश आए हैं उसकी जानकारी आसानी से मिल जाए तो श्रमिकों को बहुत सहूलियत होगी। दूसरी बात जब गाँव में दो पक्षों में बीच किसी बात को लेकर मतभेद हो जाता है तो इस मामले को लेकर सबसे पहले लोग 100 नंबर पर फोन कर अपनी बात रखते हैं। क्योंकि ग्राम पंचयत के मुखिया की बातों को लोग ज्यादा नहीं मानते हैं।

दिल्ली के बहादुरगढ़ हरियाणा से शत्रोहन लाल कश्यप ने साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि कंपनियों में श्रमिकों को समय से वेतन नहीं मिलता है। लॉक डाउन के बाद से स्थिति और भी दयनीय हो गयी है।

दिल्ली के बहादुरगढ़ हरियाणा से शत्रोहन लाल कश्यप ने साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि राजधानी के कंपनियों में काम की कमी और श्रमिकों की छटनी से मजदूरों की समस्या बढ़ गयी है

आशीष जी ने साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि उन्हें एक सप्ताह पहले कोरोना हुआ था केवल सरकारी कॉल आते रहे लेकिन सरकार की ओर कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गई।

दिल्ली के आईएमटी मानेसर गुरुग्राम से दीपक ने साझा वाणी के माध्यम से बताया कि झारखण्ड निवासी अनिल सोनी कोरोना के बढ़ते मामलों और कंपनियों में काम की कमी के कारण अपने गृह राज्य वापस जा रहे हैं।

तमिलनाडु के तिरुपुर ज़िला से मीना कुमारी ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताती है कि अभी काम की स्थिति बहुत ख़राब है। लोगों को काम नहीं मिल रहा है। पीस रेट में भी काम सही से नहीं मिल पा रहा है। इस कारण लोग वापस अपने गाँव जा रहे है।

उत्तराखंड के उधमसिंह नगर से सत्यम सिंह ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते है कि लॉक डाउन के बाद अब जब नाईट कर्फ्यू लगा है मानेसर में इस कारण उनके जीजा ड्यूटी नहीं कर पा रहे है

दिल्ली एनसीआर के मानेसर से दीपक ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते है कि बढ़ते कोरोना को देखते हुए श्रमिक वापस अपने गाँव जा रहे है। अभी वाहनों का किराया बहुत ज़्यादा है। कंपनियों में काम तो है परन्तु श्रमिक नहीं मिल रहे है। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी ख़बर..

हरियाणा राज्य के झज्जर ज़िला के बहादुरगढ़ से सतरोहन लाल कश्यप ने साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि वीकेंड लॉक डाउन से टिकरी बॉर्डर स्थित कम्पनियाँ बंद कर दी गई है। जिससे श्रमिक बेरोज़गार हो गए है



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