दिल्ली गुरुग्राम से नन्द किशोर साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से एक श्रमिक भाई बाबू लाल से वार्ता कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि लॉक डाउन के दौरान सरकार द्वारा मनरेगा में दिए जाने वाले योजना के तहत उन्हें काम नहीं मिला। लॉक डाउन खत्म होने के बाद भी उन्हें काम नहीं मिल रहा है ।

दिल्ली गुरुग्राम से नन्द किशोर साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से एक श्रमिक भाई से वार्ता कर रहे हैं। श्रमिक ने बताया कि उन्हें गांव में भी काम नहीं मिला और शहर वापस आने के बावजूद उन्हें काम नहीं मिल रहा है

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दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम के सेक्टर 23 से नन्द किशोर ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि सेक्टर 23 स्थित ताउत देवी लाल पार्क में कई भवन निर्माण श्रमिक सुबह से बैठे रहते है परन्तु उन्हें जल्दी काम नहीं मिलता है। कोरोना महामारी से श्रमिकों की स्थिति बहुत ख़राब हो गई है। काम बहुत कम मिलने के कारण उन्हें दिनचर्या के खर्च निकालने में बहुत समस्या होती है। साथ ही शेड की व्यवस्था नहीं होने के कारण कड़ी धुप में श्रमिकों को दिहाड़ी के लिए इंतज़ार करना पड़ता है।ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी ख़बर ..

दिल्ली सरहोल गुरुग्राम हरियाणा से नन्द किशोर साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कंपनियों में काम करने वाले शार्मिक भाई से वार्ता कर रहे हैं। श्रमिक ने बताया कि कंपनी में काम करना सुरक्षित है। ठेकेदारी में श्रमिकों का पैसा काट लिया जाता है ,ईएसआइ की सुविधा नहीं मिलती ,समय से वेतन नहीं दिया जाता है और वेतन भी कम दिया जाता है। कंपनी में काम करने से श्रमिकों को छुट्टी मिलती है और बोनस भी दिया जाता है जो ठेकेदारी के तहत संभव नहीं है। ठेकेदार कंपनी के बराबर वेतन नहीं देते हैं। इसलिए महंगाई को देखते हुए श्रमिकों की भी वेतन में वृद्धि की जानी चाहिए

दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से श्रमिक अनीश से हुई। अनीश बताते है कि फुल पीस के लिए कंपनी जो रेट तय करती है अगर श्रमिक उस रेट में खुश रहते है तो काम होता है अगर नहीं तो रेट को बढ़ाया जाता है। वही पार्ट के लिए अलग अलग रेट तय किया जाता है। पहले के तुलना में अब काम मंदा होने की बात कहते हुए पीस रेट कम मिलने लगा है। इसलिए सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए और इस पर भी रेट निर्धारित कर देना चाहिए ताकि श्रमिकों को पीस रेट में काम करने में कोई परेशानी न हो

दिल्ली एनसीआर के गुरुग्राम से नन्द किशोर की बातचीत साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से कारीगर वाहीर से हुई। वाहीर बताते है कि कंपनी का इंचार्ज पीस रेट तय करता है। जो कंपनी पीस के 75-80 रूपए देती है उस पीस में इंचार्ज उसका रेट खोलता है जैसे 1.75 पैसे या 2 रूपए आदि। कंपनी तो अच्छा पैसा देती है परन्तु इंचार्ज काट कर पीस रेट तय करता है। कारीगर मज़बूरी में कम रेट पर कार्य करते है। इसलिए सरकार को न्यूनतम वेतन की तरह पीस का रेट भी निर्धारित करना चाहिए

दिल्ली एनसीआर के गुडगाँव के डूंडाहेड़ा से वीरेंदर कुमार रजक ,साझा मंच मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते है कि काम की स्थिति बहुत दयनीय हो गई है। कंपनी से श्रमिकों को भी बिना वेतन दिए नकाल दिया गया है। अगर कुछ श्रमिकों को वेतन मिला भी है तो उसमे कटौती की गई है

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आपको बताना चाहेंगे कि कंपनियों में अगर 1000 से ज्यादा लोग काम करते हैं तो वहाँ 10 तारीख़ के अंदर सैलरी दे देनी चाहिए, और अगर 1000 से कम लोग काम करते हैं तो वहाँ 7 तारीख़ के अंदर तनख़्वा दे देनी चाहिए, और वह भी सरकार के न्यूनतम वेतन के आधार पर। अगर ठेकेदार आपका वेतन ठीक से नहीं दे रहा या देरी से दे रहा है तो कंपनी आपका वेतन देने के लिए उत्तरदायी है, अगर कंपनी भी आपका वेतन सही समय पर सही से नहीं देते, तो आप लेबर ऑफिस में यूनियन की सहायता से या फिर खुद भी कंप्लेंट कर सकते हैं, जहां आपको यह सबूत देना पड़ेगा की आपकी कंपनी ने आपको सैलरी नहीं दी है या सैलरी देने में देरी करती हैं। लेबर ऑफिस में 45 दिनों के अंदर अगर आपके और आपकी कम्पनी के बीच समझौता नहीं होता तो लेबर कमिशनर आपका केस लेबर कोर्ट में रेफेर कर देंगे। अगर आपका केस लेबर कोर्ट में जा चुका है तो आप उससे संबंधित सवाल पूछ सकते हैं या फिर इससे जुड़े अन्य प्रश्न सुन सकते हैं। साथ ही आपसे यह भी निवेदन है कि अगर हमारे द्वारा दी गयी जानकारी से आप संतुष्ट हैं और इससे आपकी सम्बंधित समस्या को हल करने में सहायता मिली है, तो अपना अनुभव हमसे ज़रूर साझा करें अपने मोबाईल में नम्बर तीन दबाकर
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Feb. 18, 2021, 5:37 p.m. | Tags: govt entitlements   int-PAJ   industrial work   wages   workplace entitlements  

गुरुग्राम से नंदकिशोर और इनके साथ एक मजदुर साथी हैं वे साझा मंच के माध्यम से कहते हैं कि लॉक डाउन के दौरान अपने गाँव नहीं जा पाए थे। सरकार के द्वारा गुरुग्राम में ही सभी सुविधा दी गई थी जिससे परिवार को चलाने में ज्यादा कठिनाई नहीं हो पाई थी। वहीं कम्पनी में काम नहीं मिलने के कारण कई मजदूरों को काम से निकाल दिया गया