साथियों हम सभी जानते हैं कि लॉकडाउन के बाद कंपनियों को मजदूरों की कितनी जरूरत थी, जिसके लिए कंपनियों ने बहुत से वादे कर मजदूरों को उनके घरों से वापस लाने के लिए बसें भी भेजी साझा मंच की स्वयंसेवक रेशमा जी की मुलाकात ऐसे ही कुछ मजदूर साथियों से हुई, जिन्होंने मिलकर रूम के भाड़े के लिए, कंपनी द्वारा किए गए उन्हीं के वादे को याद दिलाया। कंपनी ने रूम मालिक को मजदूरों से किराया लेने को कहा, जबकि कंपनी ने भरोसा दिया था कि रूम का भाड़ा कंपनी देगी। मजदूरों की एकता के सामने कंपनी को उनकी बात माननी पड़ी.... साथियों यह अनिवार्य नहीं है कि कंपनी कॉन्ट्रैक्ट वर्करों को रूम का भाड़ा दे, मगर जब कंपनियां खुद ऐसा कोई वादा करती हैं, तो वर्कर उसकी मांग कर सकते हैं और अगर कंपनी अपनी बाद में मुकर जाती हैं, तो मजदूर मिलकर इसका विरोध भी कर सकते हैंक्या आपकी भी कंपनी ने ऐसा कोई वादा कर अपनी बात से मुकर गई है, तीन दबाकर उसे साझा करें, धन्यवाद।
इस समय कंपनियों में काम बहुत कम चुका है, और साथ ही पीस रेट भी जादा पैसे नहीं मिल पा रहे हैं.... इन मुश्किल हालातों में अगर कोई सरकारी योजना मजदूरों की मदद कर सकती है तो वह पी.एफ है.... यह योजना इसलिए लाई गई थी ताकि मजदूरों को मुश्किल समय में आर्थिक मदद मिल सके.... मगर कुछ कंपनियों की लापरवाही की वजह से मजदूर इसका पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं....
साथियों बहुत सी कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट वर्करों को कंपनी के नज़दीक रखने के लिए प्राइवेट होस्टल मालिकों के साथ एक एग्रीमेंट साइन करती हैं.... ऐसे होस्टल मज़दूरों को रहने के लिए मुफ्त में तो दिए जाते हैं, मगर इनकी हालत बद से भी बदतर होती है, खासकर शौचालयों की हालत.... साझा मंच की स्वयंसेवक रेशमा जी की मुलाक़ात इन्हीं हॉस्टलों के कुछ मजदूर साथियों से हुई, जिन्होंने मिलकर होस्टल में समय-समय पर सफाई करवाने की मांग की, चलिए सुनते हैं.... साथियों कंपनियां प्राइवेट हॉस्पिटलों के साथ इसलिए एग्रीमेंट साइन करती हैं, क्योंकि उन्हें ना ही इन हॉस्पिटलों को रजिस्टर करवाना पड़ता है और ना ही इनका रखरखाव करना अनिवार्य होता है.... मज़दूरों को यह बात समझनी होगी, क्योंकि वही इन हॉस्टलों में रहते हैं और अगर मज़दूरों ने मिलकर इसका विरोध नहीं किया तो उन्हें कई प्रकार की बीमारियों हो सकते हैं, जिस के इलाज के लिए कंपनियां तो पैसे देने से रही.... क्या आपके भी हॉस्पिटलों में समय-समय पर सफाई नहीं होती, तीन दबाकर उसे साझा करें
साथियों हम सभी जानते हैं, कि जो प्रवासी मजदूर पहली बार दूसरे राज्य में काम की तलाश में जाते हैं, वह कंपनियों के होस्टल में रहते हैं.... खासकर प्रवासी महिलाएं.... क्योंकि वह ना किसी को जानते हैं और ना ही उन्हें स्थानीय भाषा बोलनी आती है.... मगर क्या कंपनियों के होस्टल में रहने पर, हमारी महिला मजदूर साथियों की सभी परेशानियां हल हो जाती हैं.... चलिए सुनते हैं साझा मंच के स्वयंसेवक रेशमा जी को, जिनकी बात होस्टल में रहने वाली एक प्रवासी मजदूर से हुई.... पहले 10-12 घंटे मशीनों कि तरह काम करो, फिर आधे घंटे में उस खाने को खाओ, जिसे खाकर मजदूर बीमार पड़ जाते हैं.... और फिर उसके ₹2000 भी दो, क्योंकि यही रूल्स है.... चलिए सुनते हैं इन सब का विरोध हमारी महिला साथियों ने किस तरह किया.... अगर हमारे 2000 रुपए काटे जा रहे हैं, तो हमारा खाना भी उसी प्रकार का होना चाहिए.... जी हां साथियों, जब हमारे सभी महिला मजदूर साथियों ने मिलकर आवाज़ उठाई तब कंपनी के एच.आर को सीधे तौर पर आकर उनकी बात माननी पड़ी.... साथियों नियमों के अंतर्गत कंपनी हॉस्टलों में होस्टल कमेटी का गठन करना अनिवार्य होता है, जिसमें कंपनी और मजदूर दोनों के प्रतिनिधि होस्टल की परेशानियों का हल निकालते हैं, मगर हर कंपनी इन नियमों का पालन नहीं करती.... क्या आपके भी होस्टल में मज़दूरों के परेशानियों का सामना करना पड़ता है, तीन दबाकर उसे साझा करें.... और पांच दबाकर इस कड़ी को अपने साथियों के साथ साझा करें.... धन्यवाद
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मैं अरुण आप सभी के बीच फिर से हाज़िर हूं, वनक्कम नमस्कार की एक और कढ़ी के साथ.... साथियों बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, चाहे वह ऑटोमोबाइल्स की हैं या फिर गारमेंट्स कि, इन सभी में एक समानता है.... मज़दूरों की कांट्रैक्टिंग.... जी हां साथियों, हम सभी ने कभी ना कभी किसी कांट्रेक्टर के नीचे काम किया होगा.... लेकिन अगर मज़दूरों से पूछा जाए, तो उनका कांट्रैक्टर के नीचे काम करने का अनुभव बहुत बुरा होता है.... इसका सबसे बड़ा और मुख्य कारण है, समय पर मज़दूरों की सैलरी ना देना.... आज साझा मंच की स्वयंसेवक रेशमा जी की मुलाकात ऐसे ही एक मजदूर से हुई थी, जिनका कांट्रेक्टर उन्हें समय पर सैलरी नहीं दे रहा था....
महराष्ट्र से विजय शुक्ला साझा मंच के माध्यम से कहते हैं कि वड़क्म नमस्कारम कार्यक्रम में मजदूरों के साथ कम्पनी के अंदर पीने के पानी को लेकर भेद-भाव को बताया गया यह नहीं होना चाहिए
कंपनियों में पूरा दिन काम करते हुए मज़दूरों को साफ पानी पीने कि कितनी आवश्यकता होती है, और इसलिए फ़ैक्टरी क़ानूनों के अंतर्गत यह बात बड़े ही स्पष्ट तौर पर बताई गई है, कि फ़ैक्टरियों को मज़दूरों की संख्या के हिसाब से साफ पानी प्रदान करना अनिवार्य है.... लेकिन कुछ फ़ैक्टरियों मज़दूरों को साफ पानी प्रदान करना भी, एक खर्चे के तौर पर देखती है.... आज साझा मंच की स्वयंसेवक रेशमा जी, तिरुपुर कि ऐसी ही एक गारमेंट्स कंपनी के बारे में बताने जा रही हैं, जहां मज़दूरों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल रहा था
मजदूर अपने दिन का सबसे अधिक समय अपनी कंपनी को देते हैं, लगभग 10 से 12 घंटे और यह बात बिल्कुल साफ है कि कोई भी श्रमिक 10 से 12 घंटे लगातार काम नहीं कर सकता, इसलिए कंपनी क़ानूनों के हिसाब से मज़दूरों को काम के दौरान ब्रेक दिया जाता है। मगर कुछ कंपनियों का बस चले तो वे अपने मज़दूरों को बिना ब्रेक दिए पूरे दिन काम करवा सकते हैं। आज हमारे साथ तिरुपुर कि एक श्रमिक साथी, अपनी गारमेंट्स कंपनी में टी ब्रेक को लेकर हुई एक घटना साझा कर रहे हैं। हमारे श्रमिक साथी पूरे दिन खड़े रहकर काम करते हैं, ब्रेक तो 15 मिनट का था, मगर मैनेजर 8 मिनट बाद काम ना शुरू करने पर मज़दूरों को डांट रहे थे और सिर्फ 2-3 मिनट देर से आने पर मज़दूरों से 15-20 मिनट अधिक काम करवाया जा रहा था तो सुना आपने मज़दूरों ने जब एकजुट होकर विरोध किया और अपनी बात पर खड़े रहे, तब कंपनी ने ब्रेक का समय कम करना बंद कर दिया। दोस्तों कंपनियों के मैनेजर, सुपरवाइजर और यहां तक कि कंपनी की मशीनें भी बिना ब्रेक लिए काम नहीं कर पाएंगी, मगर यह बात उन्हें मज़दूर ही समझा पाएंगे। क्या आपकी भी कंपनी में ब्रेक के समय को कम किया जाता है, तीन दबाकर अपनी बात साझा करें। अगले हफ्ते वनक्कम नमस्कार की एक और कढ़ी के साथ फिर से हाज़िर होंगे। धन्यवाद।
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