साथियों हम सभी जानते हैं, कि जो प्रवासी मजदूर पहली बार दूसरे राज्य में काम की तलाश में जाते हैं, वह कंपनियों के होस्टल में रहते हैं.... खासकर प्रवासी महिलाएं.... क्योंकि वह ना किसी को जानते हैं और ना ही उन्हें स्थानीय भाषा बोलनी आती है.... मगर क्या कंपनियों के होस्टल में रहने पर, हमारी महिला मजदूर साथियों की सभी परेशानियां हल हो जाती हैं.... चलिए सुनते हैं साझा मंच के स्वयंसेवक रेशमा जी को, जिनकी बात होस्टल में रहने वाली एक प्रवासी मजदूर से हुई.... पहले 10-12 घंटे मशीनों कि तरह काम करो, फिर आधे घंटे में उस खाने को खाओ, जिसे खाकर मजदूर बीमार पड़ जाते हैं.... और फिर उसके ₹2000 भी दो, क्योंकि यही रूल्स है.... चलिए सुनते हैं इन सब का विरोध हमारी महिला साथियों ने किस तरह किया.... अगर हमारे 2000 रुपए काटे जा रहे हैं, तो हमारा खाना भी उसी प्रकार का होना चाहिए.... जी हां साथियों, जब हमारे सभी महिला मजदूर साथियों ने मिलकर आवाज़ उठाई तब कंपनी के एच.आर को सीधे तौर पर आकर उनकी बात माननी पड़ी.... साथियों नियमों के अंतर्गत कंपनी हॉस्टलों में होस्टल कमेटी का गठन करना अनिवार्य होता है, जिसमें कंपनी और मजदूर दोनों के प्रतिनिधि होस्टल की परेशानियों का हल निकालते हैं, मगर हर कंपनी इन नियमों का पालन नहीं करती.... क्या आपके भी होस्टल में मज़दूरों के परेशानियों का सामना करना पड़ता है, तीन दबाकर उसे साझा करें.... और पांच दबाकर इस कड़ी को अपने साथियों के साथ साझा करें.... धन्यवाद