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झारखंड राज्य के हज़ारीबाग़ ज़िला के बरकट्ठा प्रखंड से बेबी कुमारी मोबाइल वाणी के माध्यम से बताती हैं, कि आज शिक्षा के बगैर मानव का जीवन बिलकुल अधूरा सा हो गया है। शिक्षा के माध्यम से ही अच्छे भले की पहचान होती है। शिक्षा से ही लोग अपने जीवन को बेहतर और सुदृढ़ कर सकते हैं। शिक्षा लोगों के लिए एक अनमोल पूंजी है। वर्तमान में ग्राम पंचायत और आस-पास के क्षेत्रों में प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में शिक्षा की स्थिति एवं शिक्षकों की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रही है। आज झारखंड सरकार शिक्षा की स्थिति को और बेहतर बनाने के लिए कई प्रयास कर रही है। साथ ही कई नई-नई योजनाएँ भी निकाल रही है जैसे-मुख्य मंत्री साईकिल वितरण योजना,छात्र-छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति योजना। ताकि ग़रीब परिवार के बच्चे बीच में अपनी पढ़ाई को ना छोड़े और आसानी से स्कूल जा सकें। आज शिक्षा विभाग एवं सरकार द्वारा प्राथमिक एवं माध्यमिक विधायालयों में मध्यान भोजन योजना भी चलाई जा रही है। जिससे बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ भोजन भी स्कूल में ही मिल सकें। लेकिन आज इन योजनाओं में कमी देखने को मिल रही है। साथ ही कई विधायालयों में शिक्षकों की भी कमी देखने को मिल रही है, जिसके कारण छात्रों पठन-पाठन कार्य बाधित हो रही है।

झारखंड राज्य के बोकारो ज़िला के जरीडीह प्रखंड से सुरेंद्र कुमार महतो मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते हैं, कि माध्यमिक एवं प्राथमिक विद्यालय का समय प्रातः नौ बजे रहती है लेकिन शिक्षक अपने समयनुसार विद्यालय नहीं आते हैं। जिस कारण छात्रों को गुणवक्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती है। साथ ही कई विद्यालय में यह भी देखने को मिलता है, कि शिक्षक बच्चों को पढ़ाने से अधिक मध्यान भोजन पर ध्यान देते हैं। जिससे यह ज्ञात होता है कि शिक्षक विद्यालय केवल मध्यान भोजन तथा वेतन पाने के लिए ही आते हैं। परीक्षा के समय छात्रों से थोड़ी खर्चे की मांग की जाती है और कहा जाता है की परीक्षा में तुम्हें पास कर दिया जाएगा। इससे यही ज्ञात होती है कि छात्रों का भविष्य उज्जवल होने की जगह अंधकारमय होता जा रहा है।

झारखंड राज्य के धनबाद जिला से रानी कुमारी मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि शिक्षा एक ऐसा हथियार है, जिससे सही और गलत में फर्क करने की सीख मिलती है।वर्तमान समय में उज्जवल भविष्य के लिए शिक्षित होना बेहद अनिवार्य है।ये तो हम सभी जानते हैं लेकिन बच्चों में अभी इतनी समझ नहीं है कि वो इसके महत्व को समझ सकें।हमारे सविंधान के 86वें संशोधन में शिक्षा का अधिकार अधिनियम को वर्ष 2009 में पुरे देश भर में लागू किया गया।लेकिन इस अधिनियम के तहत किये गए प्रावधानों का पालन नहीं किया जा रहा है चूँकि स्कूलों में वर्तमान स्थिति यह है कि एक ही शिक्षक पर 4 कक्षा का भार होता है। जिससे सरकारी स्कूलों में शिक्षा का लाभ सही रूप में बच्चों को नहीं मिल पाता है।ऐसे में बच्चों की पढ़ाई कैसी होगी यह विचारणीय विषय है। वे कहती हैं कि सरकारी स्कूलों में गरीब परिवार के बच्चें पढ़ते हैं,ना की किसी अफसर और विधायक के बच्चें। और शायद यही वजह है कि स्कूल प्रशासन,जन प्रतिनिधि और स्थानीय प्रशासन द्वारा इस मामलें पर कोई कार्यवाही भी नहीं की जाती है।आज के समय में अगर हमारे देश के बच्चें ही कमजोर रहेंगे तो हमारे देश का भविष्य कैसे उज्जवल होगा ? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।इस परिस्थिति को सुधारने के लिए सरकार को प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

झारखंड राज्य के गोड्डा जिला से निरंजन सिंह मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते हैं कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में तब ही सुधार आ सकेगा जब सरकार और जनता दोनों ही मिल कर प्रयास करेगी।लेकिन आज तक सरकार का ध्यान इस तरफ गया ही नहीं है।सरकार सिर्फ कागजी खाना-पूर्ति में ही व्यस्त रह जाती है।सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए ज्यादातर पारा शिक्षक होते हैं और स्कूलों में सरकारी शिक्षक मौजूद नहीं होते हैं।पारा शिक्षकों द्वारा बच्चों की पढ़ाई सही ढंग से नहीं हो पाती है।अभिभावकों को भी जागरूक होने की जरुरत है।आज के समय पर अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाते हैं।सरकारी स्कूलों में वही बच्चे पढ़ते हैं,जो बहुत ही गरीब परिवार से होते हैं।उन्होंने यह भी बताया कि स्कूलों में मिलने वाला मध्यान भोजन की ओर बच्चों का ध्यान रहता है और बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते हैं।ऐसे में मध्यान भोजन से स्कूलों में बच्चों की उपस्थित तो बढ़ी है लेकिन गुणवत्तपूर्ण शिक्षा में बढ़ोतरी नहीं हुई है।चूँकि बच्चे स्कूल तो आते हैं लेकिन सिर्फ मध्यान भोजन खाकर वो घर जाने की तैयारी में लगे रहते हैं।अत: वे कहते हैं कि मध्याहन भोजन की राशि सीधे बच्चों के खाते में देने की व्यवस्था होनी चाहिए तभी शिक्षा की स्थिति में सुधार होगा। साथ ही इसके लिए अभिभावकों को भी जागरूक होना होगा।

झारखंड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला के चुरचू प्रखंड से मोहम्मद ताजीम अंसारी मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते हैं, कि प्राथमिक एवं मध्य विधालय में प्रबंधन समिति बनाए गए हैं। परन्तु प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं माता समिति बच्चों को सही से किसी भी तरह का लाभ नहीं देते हैं। क्योंकि प्रबंधन समिति के लोगों में काफी लचीला पन देखने को मिल रहा है। प्रबंधन समिति द्वारा ना ही स्कूलों की जाँच की जाती है और ना ही यह देखा जाता है कि क्या शिक्षक स्कूल में उपस्थित हैं या नहीं। चुरचू प्रखंड के कई पंचायतों में बने स्कूलों में जिस आधार पर बच्चों की संख्या है उसके अनुसार शिक्षक की उपस्थिति नहीं है। साथ ही सरकार की ओर से मिलने वाले पोषक आहार बच्चों तक सही समय पर नहीं पहुंच पता है।

झारखंड राज्य के बोकारो जिला के नावाडीह प्रखंड से महावीर महतो मोबाइल वाणी के माध्यम से बताते हैं, कि भारत के इतिहास में 1 अप्रैल 2010 एक ऐतिहासिक दिन था। इसी दिन बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम लागू किया गया था। शिक्षा के अधिकार को वैसा ही वैधानिक स्तर प्रदान किया है, जैसा की भारतीय संविधान के अनुछेद 21-(क) में उपलब्ध है।इस अधिनियम के तहत छः से चौदाह वर्ष के बीच के उम्र वाले प्रत्येक बच्चों को प्रथम से आठवीं वर्ग तक की मुफ्त प्रारंभिक शिक्षा उसके घर के आस-पास के स्थित स्कूलों में दिया जाना है। इससे भारत का निर्माण करने के लिए बुनियादी जरूरतें प्रदान की जा सकेगी।शिक्षा के क्षेत्र में प्रत्येक बच्चा चाहें वो गरीब हो या अमीर वो एक जैसा ही सपना देख सकेंगे और उन्हें प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध हो पाएगी। पूर्व प्रधान मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने वर्ष 2010 से 2020 को नवाचार का दशक घोषित किया था। इस प्रयाजनार्थ पूर्वरुपिये सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में दूरगामी सुधार की घोषणा की थी । जो सत्ता में लौटने के बाद प्रथम 18 माह में किए जाएँगे तथा उत्कृष्टता विस्तार समग्रह के सिद्धांत पर बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए संस्थान स्थापित करने की बात भी । लेकिन वर्तमान में अबतक बुनियादी प्रारंभिक शिक्षा मध्य विद्यालयों में छात्र-छात्राओं के लिए समुचित आर्थिक शिक्षा व्यवस्था सुचारु रूप से करने में नाकाम रही है। आज कई विद्यालयों में पानी,भवन,बेंच,भोजन एवं जरुरत के अनुसार शिक्षकों की भरपाई नहीं हो पाई है। जिससे छात्र-छात्राओं को पठन-पाठन में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

झारखण्ड राज्य के गोड्डा जिले से अनुजा दुबे मोबाइल वाणी के माध्यम से बताती हैं कि इनके क्षेत्र में दो सरकारी स्कूल है जिसमे आठवीं,नौवीं एवं दशवीं कक्षा चलती है लेकिन इन स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और आठवीं,नौवीं एवं दशवीं कक्षा के बच्चों को एक ही शिक्षक पढ़ाते हैं। यही वजह है कि गांव के सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं दी जाती है। जिससे अभिभावक अपने बच्चों का नामांकन निजी स्कूल में करातें हैं। ताकि उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके। सरकार से यह कहना चाहती हैं कि सरकारी एवं निजी स्कूलों में जो भेदभाव की जा रही है, उसे दूर करने की जरुरत है।यदि सभी स्कूलों में बच्चों को एक समान शिक्षा दिया जाए, तो शिक्षा के स्तर में सुधार हो पाएगी। अतः सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे इस भेद भाव को ख़त्म करने के लिए कोई कठोर कदम उठाया जाए।

झारखंड राज्य के गिरिडीह जिला के जमुआ प्रखंड से शिव चरण कुमार वर्मा ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि उनके क्षेत्र में स्थित न सिर्फ सरकारी विद्यालय बल्कि निजी विद्यालयों में भी शिक्षा का स्तर काफी गिरता जा रहा है। जिससे अभिभावक काफी परेशान हैं। मजबूरन गरीब परिवार अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में पढ़ाते हैं, जहाँ शिक्षा की स्थिति काफी दयनीय हो चुकी है।ज्यादातर सरकारी विद्यालयों में पारा शिक्षक ही होते हैं और उनमें गुणवक्तापूर्ण शिक्षा की काफी कमी पाई जाती है। जिस कारण पारा शिक्षक बच्चों को उचित शिक्षा नहीं दे पाते हैं।इसकी तुलना में अगर बात की जाये निजी स्कूलों की तो निजी स्कूलों में बच्चों को उचित शिक्षा प्राप्त हो जाती है।और यही वजह है कि लोग अपने बच्चों को निजी विद्यालय में भेजना चाहते हैं लेकिन यह देखा जाता है कि निजी विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाने में काफी पैसे खर्च हो जाते हैं।जो एक गरीब परिवार पूरा करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। अतः यदि सरकार जमुआ प्रखंड में स्थित सरकारी स्कूलों की जाँच करें, तो कई ऐसे विद्यालय हैं, जहाँ पर शिक्षकों की उपस्थिति ना के बराबर पाई जाती है।

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