झारखण्ड राज्य के खूँटी जिला के तोरपा प्रखंड के पटपुरा बाबर टोली से हमारे श्रोता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि जल ,जमीन और पर्यावरण में बदलाव और तापमान में वृद्धि एक बड़ी समस्या है। गांव के विकास और स्वास्थय के लिए यह समस्या गंभीर है। प्राकृतिक संसाधनों,मिटटी ,पानी और हवा में प्रदुषण और असंतुलन बढ़ा है। इन समस्याओं के विकास और गांव के विकास के लिए बड़े और बुजर्गों के अनुभव और आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों का तालमेल जरूरी है। जल और जमीन का उपचार -लोगों को पुराने तालाबों की सफाई, वर्षा जल संचायन और मिटटी की जांच करा कर जैविक खेती अपनाना चाहिए। स्वच्छता और गंध का समाधान -गांव में ठोस और तरल उपशिष्ट प्रबंधन लागू करना चाहिए,खुले में कचड़ा नहीं फेंकना चाहिए और खाद के गड्ढे बनाने चाहिए। तापमान में कमी -हर साल गांव में बड़े पैमाने पर स्थानीय पौधे लगाने चाहिए। जैसे -नीम ,पीपल ,बरगद आदि लगाने चाहिए ताकि यह छाया और ऑक्सीजन प्रदान करे।बुजुर्गों से सलाह लेनी चाहिए। परंपरागत जल संरक्षण तकनीकों और स्थानीय जड़ी -बूटियों के ज्ञान का उपयोग करना चाहिए। गांव के विकास के लिए सरकारी योजनाओं जैसे -मनरेगा के तहत वृक्ष रोपण ,जल शक्ति अभियान का लाभ उठाना चाहिए। गांव के विकास के लिए फण्ड और योजनाएं पंचायत के पास आती है और लोग पोर्टल पर भी जा कर देख सकते हैं कि गांव के विकास के लिए कितना बजट आया है और कहाँ खर्च हो रहा है। तापमान कम करने के लिए सबसे सस्ता और टिकाउ साधान वृक्षा रोपण है।
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झारखण्ड राज्य से हमारे श्रोता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहती हैं कि उनको एपिसोड -1 के माध्यम से लाह की खेती करने की जानकारी मिली।इस कार्यक्रम में विभिन्न तरीकों से लाह की खेती करने के बारे में बताया गया है।वह लाह की खेती पलास के पेड़ पर ही किया करती थीं,लेकिन उनको इस कार्यक्रम के माध्यम से यह पता चला कि सेमियालता पर लाह की खेती किया जा सकता है और इसमें उत्पादन बहुत अच्छी होती है।सेमियालता का उत्पादन करने से उर्वरक शक्ति भी बढ़ती है। एपिसोड 2 और 3 में मौसम के बारे में बताया गया है।वर्षा के कम या अधिक होने के कारण उत्पादन सही तरीके से नहीं हो पाता है।किसान और माता -पिता मौसम पर ही निर्भर रहते हैं। मौसम में परिवर्तन हो रहा है क्योंकि पर्यावरण पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं।लोग पेड़ों को काट भी रहे हैं और नया पौधा भी नहीं लगा रहे हैं।पेड़ों को काटने के कारण मौसम में परिवर्तन हो रहे हैं और लोग फसल का उत्पादन सही समय पर नहीं कर पा रहे हैं। उनको इस कार्यक्रम के माध्यम से पानी को बचाने के बारे में भी जानकारी मिली है।लोग इस कार्यक्रम में बताये गए बातों को उपयोग में लाएंगे तो उनको जरूर लाभ मिलेगा
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से टेक नारायणा प्रसाद कुशवाहा ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि पहले किसान खेती बारी के साथ-साथ खुद पौधे और बीज अपने घरों में बनाने के काम करते थे। परन्तु बदलते मौसम के कारण अब किसान आलू,बैंगन,खीरा, गोभी,कद्दू,इत्यादि का फसल तो लगाते हैं,परन्तु खेतों में बीज उत्पन्न नहीं करते है। बीज के लिए कंपनी पर निर्भर रहते हैं। इससे किसान को काफी आर्थिक क्षति होने की संभावना बनी रही है। बदलते मौसम की दौर में किसानों को अपने घर में अपने तरीके से बीज बनाने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से टेक नारायणा प्रसाद कुशवाहा मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि सरकार वन पट्टा देने की बात करती हैं और लोग इससे परेशान होते हैं। जिस खेत पर लोग फसल उगाते हैं उस जमीन पर वन विभाग पेंड़ लगाने की बात कर रहे हैं जिसके कारण जनता असंतुष्ट है। सरकार उस जमीन में वन लगाना चाहते हैं। वन विभाग उस जमीन पर जबरन अधिग्रहण कर रहा है
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से टेक नारायणा प्रसाद कुशवाहा मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि पेयजल का मीनार दो साल से कबाड़ पड़ा हुआ है। सरकार के द्वारा जो पेयजब की मीनार बनाकर लोगों को घर घर तक पहुंचाने के काम किया जाना सुनिश्चित किया किया गया था आज देखने को मिल रहा है की उस मीनार में न बोर्डिंग का पता है न ही पानी का पता है मात्र टंकी बैठा कर के ऊपर में दो साल से पड़ा हुआ है। जनता कोसी किसी तरह का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है और बीच बीच में उस विभाग के लोग आते हैं तो कभी तरी चालक लगाते हैं तो कभी कुछ यन्त्र लगाते हैं परन्तु मात्र लगाने का ही नाम लेते हैं और पानी चालु करने का अभी तक कोई जोर नहीं दिया गया है।
झारखण्ड राज्य के रांची जिला से सिद्धार्थ राज मंडल मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति में, फसल को बचाने और मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए खेतों में ट्रेंच खोदना एक प्रभावी जल संरक्षण तकनीक है। यह विधि वर्षा जल को इकट्ठा करती है, मिट्टी के क्षरण को कम करती है, और पानी की कमी के दौरान फसलों को आवश्यक नमी प्रदान करती है।
