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-Chinook पर है दुनिया के 26 देशों का भरोसा, कई जगहों पर निभा चुका है बड़ी भूमिका -रक्तदान कर आरएसएस के स्वयं सेवकों ने मनाया शहीद दिवस -लोकसभा चुनाव के लिए वाहनों की धर-पकड़ शुरू -NFU पर मोदी सरकार के स्‍टैंड से पूर्व सैनिक नाराज, अभी नहीं मिलता फायदा -कोलकाता ने टॉस जीता, पहले गेंदबाजी का फैसला

-प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन पेंशन योजना में 3,000 रुपए -2025 तक मिलेगा टीबी से छूटकारा -दिव्‍यांग वोटरों को खास सुविधा -अब शाम आठ बजे के बाद बाहर नहीं जा सकेंगे एमबीबीएस के छात्र -प्रतिबंध के बाद वापसी कर रहे वार्नर पर होगी सबकी निगाहें

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-4.74 करोड़ किसानों को अगले महीने मिलेगी 2000 रुपये की दूसरी किस्त -टाटा मोटर्स में 500 कर्मियों को मिलेगा प्रमोशन -शहर के दो लाख लोगों को नहीं मिला पानी -1.91 किमी. टनल तैयार लेकिन नहर का काम लटका, गर्मी में किसानों को नहीं मिलेगा पानी -भारत ने अपने पहले मुकाबले में जापान को 2-0 से हराया

-वाइस एडमिरल करमबीर सिंह होंगे अगले नौसेना प्रमुख, सुनील लांबा की जगह लेंगे -सीसीटीवी की निगरानी में रहेगी बोकारो थर्मल की जनता -बदहाल है कनहरी पहाड़ी, ध्वस्त हो रहा गुंबद -EPFO का दावा- जनवरी में 8.96 लाख लोगों को मिले जॉब, 17 महीने में 76.48 लाख नए रोजगार -IPL 2019 : आईसीसी की इस खास लिस्ट में विराट और धोनी शामिल नहीं

आज कल लोग सीधे इंटरनेट से संगीत सुनना पसंद करते हैं. यू-ट्यूब और ऐसे ही दूसरे माध्यमों से संगीत की स्ट्रीमिंग होती है.लेकिन, पहले ऐसा नहीं था. कैसेट, सीडी और रिकॉर्ड से संगीत का लुत्फ़ उठाया जाता था.पिछले कुछ सालों से इन पुराने माध्यमों ने फिर से बाज़ार में वापसी की है. विनाइल रिकॉर्ड की बिक्री में तो 2007 के बाद से 1427 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है. पिछले साल अकेले ब्रिटेन में ही 40 लाख एलपी रिकॉर्ड बिके.विनाइल रिकॉर्ड में आ रही बिक्री का मतलब ये है कि ये डिस्क बनाने का काम तेज़ होगा. दिक़्क़त ये है कि इन्हें रिसाइकिल नहीं किया जा सकता. मतलब ये कि इनकी बिक्री बढ़ने से पर्यावरण को नुक़सान ज़्यादा होगा.पीवीसी को नष्ट करने में सदियां गुज़र सकती हैं. यानी इनका कचरा नष्ट होने तक इंसानों की कई पीढ़ियां बीत जाएंगी. ये मिट्टी में मिलने पर ज़मीन को भी नुक़सान पहुंचाते हैं.आज जो रिकॉर्ड बनते हैं उनसे आधा किलो कार्बन डाई ऑक्साइड पर्यावरण मे मिलती है.ऐसे में केवल ब्रिटेन में 40 लाख एलपी रिकॉर्ड बिकने का मतलब है क़रीब 2 हज़ार टन कार्बन डाई ऑक्साइड पर्यावरण में घुली. इसके अलावा इन रिकॉर्ड को लाने-लेजाने के दौरान जो प्रदूषण हुआ सो अलग.

घर के अंदर का वायु प्रदूषण दूसरा सबसे बड़ा हत्यारा है, जो भारत में हर साल लगभग 13 लाख मौतों का कारण बनता है.यह एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है, और भारत जैसे देश में, जहां घर के अंदर खाना पकाने से लेकर हानिकारक रसायनों और अन्य सामग्रियों के कारण मकान के अंदर की हवा की गुणवत्ता भी खराब हो जाती है और यह बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में 10 गुना अधिक नुकसान कर सकती है. खराब वेंटिलेशन से फेफड़ों के कामकाज में कठिनाई सहित कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं. स्थिति इस नाते और खराब हो रही है, क्योंकि भारत में घर के अंदर हवा की गुणवत्ता पर कोई पुख्ता नीति नहीं है, जिस कारण इसके वास्तविक प्रभाव को मापना मुश्किल है.घर के अंदर प्रदूषण के कुछ दुष्प्रभावों में आंखों, नाक और गले में जलन, सिरदर्द, चक्कर आना और थकान शामिल है. इसके अलावा, यह लंबी अवधि में हृदय रोग और कैंसर का कारण बन सकता है.

शहर के 15 से 20 दोस्तों का ग्रुप पिछले कई सालों से सुबह सैर करने का पाबंद है। सैर करते अकसर सड़कों और गलियों में पॉलीथिन और अन्य कचरा देख आपस में विचार तो होता, लेकिन बात केवल विचारों तक ही सीमित रह जाती। एक दिन अखबार में पटियाला की स्वच्छ भारत में रैं¨कग बिगड़ने की खबर देख मन में इसे सुधारने के लिए कुछ प्रयास करने के बारे में सोचा तो सुबह सैर वाली बात दिमाग में घूम गई। अगले दिन सुबह सभी दोस्तों के साथ मी¨टग की और ग्रेट ¨थकर्स नाम की संस्था बना दी। मी¨टग में तय हुआ कि सभी मिलकर शहर को पॉलीथिन फ्री बनाएंगे और ग्रुप को ग्रेट ¨थकर्स संस्था का नाम दे दिया गया। संस्था के प्रधान कर्मजीत ¨सह सेखों और जनरल सचिव गुरकिरत ¨सह ने बताया कि पिछले करीब एक साल से संस्था का एक ग्रुप शहर को पॉलीथिन बनाने के लिए हर रविवार एक जगह का चयन करता है। जिसके बाद निगम के सहयोग से वहां मौजूद पॉलीथिन व कचरे को इकट्ठा कर डिस्पोज ऑफ किया जाता है।सुबह सैर करने वालों के लिए संस्था ने लोहे की विशेष स्टिक तैयार करवाई है। इसकी मदद से रास्ते में पड़े प्लास्टिक, पॉलीथिन, कागज इकट्ठा कर डस्टबिन में डाल देते हैं। नगर निगम कर्मचारियों को इसे डिस्पोज ऑफ करने के लिए सौंप दिया जाता है। इसके तहत अब तक संस्था शहर के करीब 15 इलाकों को पॉलीथिन फ्री बना चुके हैं

वायु प्रदूषण के संपर्क में थोड़ी देर के लिए भी आने से गर्भपात का खतरा बढ़ सकता है. एक नए अध्ययन में यह चिंतित करने वाली बात सामने आई है.वायु प्रदूषण को दमा से लेकर समयपूर्व प्रसव तक, स्वास्थ्य पर पड़ने वाले तमाम बुरे प्रभावों से जोड़ कर देखा जाता है.अमेरिका के यूटा विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि यूटा राज्य की सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं जब वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ने के बाद उसके संपर्क में आईं तो उनमें गर्भपात होने का खतरा ज्यादा (16 प्रतिशत) बढ़ गया.2007 से 2015 तक किए गए इस अध्ययन में 1300 महिलाएं शामिल थीं जिन्होंने गर्भपात के बाद (20 हफ्ते की गर्भावस्था तक) चिकित्सीय मदद के लिए आपातकालीन विभाग का रुख किया था.अनुसंधानकर्ताओं की टीम ने हवा में तीन साधारण प्रदूषक तत्वों - अतिसूक्ष्म कणों (पीएम 2.5), नाइट्रोजन ऑक्साइड और ओजोन की मात्रा बढ़ जाने के बाद तीन से सात दिन की अवधि के दौरान गर्भपात के खतरे को जांचा.