बिहार राज्य के समस्तीपुर जिला से मोबाइल वाणी संवाददाता दीपक कुमार ने बथुआ ग्राम निवासी सोनी से साक्षात्कार लिया। जिसमें उन्होंने जानकारी दी की वो कई दिनों से बैंक में खाता खुलवाने के लिए चक्कर काट रही हैं। लेकिन किसी भी बैंक में उनका खाता नहीं खोला जा रहा है। बैंक कर्मचारी लॉक डाउन का हवाला दे कर उन्हें वापस भेज देते हैं। इस कारण उनके परिवार को समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।जबकि सरकार द्वारा अब तक ऐसी कोई भी आदेश जारी नहीं की गई है।

समस्तीपुर जिले के प्रद्युमन बताते हैं की उनका 19 अप्रैल को हैदराबाद जाने का टिकट बना था। लेकिन वो जहाँ कार्य करते हैं,उनके मालिक ने उन्हें काम पर आने से मना कर दिया है। जिसके कारण अब उन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए भी सोचना पड़ रहा है। विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।

कोविड-19 से सुरक्षा एवं बचाव हेतु स्वास्थ्य विभाग की समीक्षात्मक बैठक की गई।विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।

युवा किसान सलाहकार सुरेन्द्र भी कोरोना के भेंट चढ़े, किसान महासभा ने दिया श्रद्धांजलि ताजपुर, 20 अप्रैल '21 प्रखण्ड के कोठिया पंचायत निवासी दीप नारायण सिंह के युवा पुत्र सह कृषि सलाहकार सुरेन्द्र प्रसाद रौशन(45)कोरोना के भेंट चढ़ गये. मंगलवार को पारस अस्पताल दरभंगा में करीब 2-30 बजे वे अंतिम सांस लिये। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी खबर को।

कल आगजनी की घटना में देखते ही देखते आठ घर जल कर राख हो गए। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी खबर को।

सरकार एवं जिलाधिकारी के कारबाई से मुखिया एवं वार्ड मेंबर नहीं डरते. यहीं कारण है कि नल जलापूर्ति करने के तय समय सीमा 31 मार्च समाप्ति के बाद भी ताजपुर पंचायत के आधे से अधिक वार्ड में नल जलापूर्ति शुरू नहीं किया गया है. पंचायत के 5, 7, 8, 10, 13 आदि वार्डों में या तो कहीं बोरिंग नहीं गाड़ा गया है या टंकी नहीं लगाया गया है जबकी पैसे का उठाव कर लिया गया है। पूरे प्रखंड में नलजल योजना लूट योजना का पर्याय बना हुआ है. इसमें तमाम सामग्री नकली ईस्तेमाल किया जा रहा है. सरकारी निर्देश के अनुसार आईएसआई सामान लगाना है जबकी बोरिंग पाईप, सप्लाई पाईप, नल, जोइंट, टंकी आदि पर आईएसआई मार्का का नामोनिशान नहीं है. पाईप 3 फिट अंदर रहने के बजाय उपर ही उपर दिखता रहता है. बढ़ती तपिश के कारण ग्रामीण पेयजल के लिए परेशान हैं लेकिन मुखिया एवं वार्ड मेंबर कान में तेल डाले सोये हुए हैं. यहाँ तक कि जिलाधिकारी द्वारा बार- बार कारबाई करने के चेतावनी का भी असर ढ़ीठ जनप्रतिनिधि पर नहीं पड़ता है इस बाबत पेयजल संकट को लेकर लोगों की शिकायत पर भाकपा माले के शंकर सिंह, बासुदेव राय, ब्रहमदेव प्रसाद सिंह, राजदेव प्रसाद सिंह, संजय शर्मा आदि की टीम ने प्रखण्ड सचिव सुरेन्द्र प्रसाद सिंह के नेतृत्व में पंचायत के विभिन्न वार्डों में जाकर नलजल योजना के साथ पेयजल का निरिक्षण करने के बाद जिलाधिकारी से पेयजल संकट के समाधान हेतु सभी वार्डों में बोरिंग, गाड़ने, टंकी लगाने, अधूरे कार्यों को पूरा कर नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करने अन्यथा जिम्मेवार मुखिया, वार्ड मेंबर, पीएचईडी के पदाधिकारी एवं कर्मी पर कारबाई करने की मांग की है. माले सचिव ने कहा है कि यदि यथाशीघ्र मांग पूरा नहीं किया जाता है तो ग्रामीणों के साथ मिलकर भाकपा माले आंदोलन चलाने को बाध्य होगी.

आशा सेवा संस्थान के सचिव अमित कुमार वर्मा द्वारा चैती नवरात्रा के अवसर पर दुर्गा स्थान,वैनी, पूसा में माता के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं को सैनीटाइजर से सैनीटाइज कर उन्हें मास्क दिया गया और लोगो को कोरोना महामारी के प्रति जागरूक किया गया।विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।

बिहार राज्य के समस्तीपुर जिला से मोबाइल वाणी संवाददाता दीपक कुमार ने जीवक सादा से साक्षात्कार लिया जिसमें उन्होंने बताया कि उनका एक न्यायलय से संबधित विवाद है। पूर्वजों के समय से जमीन को लेकर मुकदमा चल रहा है।हमारे जमीन पर जमींदारों के द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया है।इस मामले में उन्होंने अपने बुजुर्गों के समय के कुछ लोगों से सलाह लिया। इस दौरान उन्हें जानकारी प्राप्त हुई की यह जमीन उनके पूर्वजों की ही है। लेकिन दबंगता के कारण उस जमीन पर कब्ज़ा कर लिया गया है। कुछ लोगों ने उस जमीन के कागजात भी देखे हैं।उनसे सलाह लेने का उद्देश्य ही यह था की सच की जानकारी हो जिसके आधार पर आगे कार्रवाई की जा सके।यह कागजात कैथी भाषा में लिखा हुआ था। जिसका मैंने हिंदी में अनुवाद करवाया था। जिससे मुझे पता चला की यह जमीन हमारी ही है। अब अनुवाद का कार्य भी बहुत मुश्किल हो गया है। समस्तीपुर जिला उनके प्रखंड से दस किलोमीटर दूर है।इतनी दूर जा कर ही अब अनुवाद का कार्य करवाया जा सकता है। गाँव में ऐसा कोई भी नहीं है,जिसे कैथी भाषा आती हो।खतियान सभी के पास उपलब्ध नहीं होता है।कुछ ही लोगों के पास खतियान रहता है।किसी भी जमीन के खतियान के लिए दरभंगा जाना पड़ता है।वहाँ मुंशी से सलाह लेते हैं की यह कार्य किससे करवाना सही होगा। इसके बाद दूसरे मुंशी से मिल कर कागजात चेक करवाते हैं और फिर वंशावली मिलान करते हैं।इसके बाद जमीन मालिक से पूछा जाता है,तब खतियान बनता है। इस कार्य में भी एक माह से ज्यादा का समय लगता है।इसके साथ ही बार-बार जाना भी पड़ता है। जिसके कारण काफी समय और पैसे लग जाते हैं।खतियान बनने के बाद अंचल में आवेदन कर मैंने रसीद काटने की अपील की।यहाँ भी पैसों की माँग की जाती है। जिसके कारण इस जमीन की रसीद मुझे नहीं मिली। विपक्षी पार्टी ने प्रशासन बुला कर जमीन पर अपना अधिकार बताया। जिसके बाद थाना प्रभारी ने दोनों पक्षों से कागजात ले कर कोर्ट को भेज दिया।जिसके बाद हमने इस जमीन पर घर बना लिया।इसके बाद प्रशासन ने जमीन खाली करने को कहा। जब हमने इंकार किया तो मुंशी द्वारा नोटिस दिया गया।मुंशी ने बताया की धारा 144 और 107 लगा दिया गया है।इस धारा की जानकारी हमें वकील से मिली की इसमें क्या होता है। नोटिस के 10 दिनों के अंदर कोर्ट के समक्ष उपस्थित होना था। इसके बाद मैंने गाँव के कुछ बुद्धिजीवियों के साथ कोर्ट जाने का निर्णय लिया जिन्हें कोर्ट के मामलों जानकारी थी।वकील की बातें समझ नहीं आती इसलिए मैंने ग्रामीणों का सहयोग लिया। वकील से मिलने के बाद जानकारी मिली की आपको सात लोगों का बेल करवाना होगा। इसके साथ ही धारा 107 की तारीख चलेगी। तीन हजार रूपये पर वकील काम करने को सहमत हुए। जिसके बाद मैंने ब्याज पर कर्ज ले कर उन्हें पैसा दिया।वकील ने बताया की आपके कागजात सही हैं। विपक्ष के कागजात फर्जी होने की बात कही गई।वकील से मैंने अपने जमीन के बारे में पूछा तो बताया की इसके लिए मुकदमा लड़ना होगा। इसके साथ ही खर्च भी लगेगा। जिसके कारण मैं पीछे हट गया।वकील और जज के दरमियान जो भी बातें होती है वो हमारे समझ के बाहर की बात है।हमारे पास इतना समय नहीं हो पाता है की इन सब बातों पर विस्तृत जानकारी ले सकें। मजदूरी करना भी जरुरी होता है क्योंकि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हैं। बेल होने के बाद वकील तारीख पर नहीं बुलाते हैं। 15 दिन या एक महीने पर वकील को कुछ पैसे दे देते हैं। वकील ही आगे का काम देख रहे हैं।अगर कोर्ट से जुड़े मामले ऑनलाइन हो जाये और मुकदमों की जानकारी भी ऑनलाइन मिले तो समय के साथ पैसों की भी बचत होगी

सुनिए शिवाजी नगर प्रखंड अंतर्गत परसा पंचायत के जनता से क्यों ना खुश हैं वर्तमान मुखिया से।

बिहार राज्य के समस्तीपुर जिला के गंगसारा से मोबाइल वाणी संवाददाता दीपक कुमार ने रविन्द्र पासवान से साक्षात्कार लिया जिसमें उन्होंने जानकारी दी कि हमारी कोशिश होती है की किसी भी विवाद का निपटारा पंचायत स्तर पर ही कर लिया जाये। लेकिन जब किसी कारण से जबरन कोई मुकदमा दायर कर दिया जाता है तो,ऐसी परिस्थिति में हमें न्यायालय का रुख करना ही पड़ता है।जब किसी के ऊपर कोई मुकदमा होता है,तो इसकी जानकारी थाने के माध्यम से होती है। अगर मुकदमा सीधे कोर्ट में किया गया है तो नोटिस के द्वारा जानकारी मिलती है।अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने जानकारी दी की जब मुझे कोर्ट के द्वारा नोटिस प्राप्त हुई,तो बहुत घबराहट और कई तरह की चिंता होने लगी। इसके बाद पंचायत के मुखिया से संपर्क कर मैंने आगे की जानकारी लेने की कोशिश की।इसके बाद उनके सहयोग से हम कोर्ट तक गए और वकील के माध्यम से आगे की कार्रवाई की।आज भी गाँव में ऐसी परिस्थिति होने पर ग्रामीण गाँव के बुद्धिजीवियों से जरूर राय लेते हैं। इसके बाद ही कोई निर्णय ले कर आगे की कार्रवाई करते हैं।जब मेरे ऊपर मुकदमा किया गया था,तो इस पूरी कार्रवाई में मुझे 15 से 16 वर्ष लग गए।ऐसे में ग्रामीणों को लगता है की मेरे पास इन सब बातों का काफी अनुभव है। इसलिए लोग मुझसे भी राय-विचार करने आते हैं।ऐसे में मैं उन्हें यही सुझाव देता हुँ की ग्राम कचहरी के माध्यम से कम परेशानी,कम समय में और कम खर्च में आप न्याय प्राप्त कर सकते हैं। अगर आप कोर्ट का सहारा लेंगे तो काफी दौड़-भाग के साथ ही अधिक खर्च और काफी लम्बे समय के बाद न्याय प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने बताया की कोर्ट के कार्रवाई के दौरान हर स्तर पर पैसे देने पड़ते थे। मुंशी जब पेपर बनाते थे तब भी पैसा देना होता था। जब वकील का हस्ताक्षर होता था तब भी पैसे की माँग की जाती थी।इसके बाद बहस के समय भी पैसा देना होता था।कोर्ट में बहस के दौरान जो भी बातें होती थी वो समझ में नहीं आती थी। बहस के बाद वकील से पुछने पर जानकारी मिलती थी।कार्रवाई के दौरान जो भी कागजात होते थे ,वो वकील और मुंशी के पास ही होती थी।कागजात में लिखें कुछ विवरण तो हमें समझ में आ जाती है। लेकिन उसमें लगाये गए धारा के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं होती। वकील से पूछने कोई ख़ास जानकारी नहीं प्राप्त होती थी।मुकदमा के दौरान हर माह केस का खर्च हजार रूपये लगता है।शुरुआत में हर माह जाने के बाद कुछ समय बाद दो या तीन महीने में वकील को पैसे दे देते थे। लेकिन ऐसी परिस्थिति में पैसा देर से मिलने पर वकील द्वारा कोर्ट बुलाया जाता था की आपको भी सुनवाई के दौरान उपस्थित होना जरुरी है। जबकि ऐसा कुछ नहीं होता था। पैसों के कारण हमें उपस्थित रहने की जरूरत बताई जाती थी।वकील और मुंशी के द्वारा बस पैसों की उगाही की जाती है।अगर वकील के मन मुताबिक़ पैसे नहीं दिये जाते हैं,तो काम में देरी की जाती है। जिसके कारण सुनवाई दूसरे पहर में होती थी। कोर्ट और घर की दूरी 30 किलोमीटर की होती थी। ऐसे में हमें रात भर वहीँ रुकना पड़ता था। इसमें परेशानी और खर्च दोनों ही बढ़ जाता है। इसके साथ ही उस दिन कोई कमाई भी नहीं हो पाती है