बिहार राज्य के समस्तीपुर जिला के गंगसारा से मोबाइल वाणी संवाददाता दीपक कुमार ने रविन्द्र पासवान से साक्षात्कार लिया जिसमें उन्होंने जानकारी दी कि हमारी कोशिश होती है की किसी भी विवाद का निपटारा पंचायत स्तर पर ही कर लिया जाये। लेकिन जब किसी कारण से जबरन कोई मुकदमा दायर कर दिया जाता है तो,ऐसी परिस्थिति में हमें न्यायालय का रुख करना ही पड़ता है।जब किसी के ऊपर कोई मुकदमा होता है,तो इसकी जानकारी थाने के माध्यम से होती है। अगर मुकदमा सीधे कोर्ट में किया गया है तो नोटिस के द्वारा जानकारी मिलती है।अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने जानकारी दी की जब मुझे कोर्ट के द्वारा नोटिस प्राप्त हुई,तो बहुत घबराहट और कई तरह की चिंता होने लगी। इसके बाद पंचायत के मुखिया से संपर्क कर मैंने आगे की जानकारी लेने की कोशिश की।इसके बाद उनके सहयोग से हम कोर्ट तक गए और वकील के माध्यम से आगे की कार्रवाई की।आज भी गाँव में ऐसी परिस्थिति होने पर ग्रामीण गाँव के बुद्धिजीवियों से जरूर राय लेते हैं। इसके बाद ही कोई निर्णय ले कर आगे की कार्रवाई करते हैं।जब मेरे ऊपर मुकदमा किया गया था,तो इस पूरी कार्रवाई में मुझे 15 से 16 वर्ष लग गए।ऐसे में ग्रामीणों को लगता है की मेरे पास इन सब बातों का काफी अनुभव है। इसलिए लोग मुझसे भी राय-विचार करने आते हैं।ऐसे में मैं उन्हें यही सुझाव देता हुँ की ग्राम कचहरी के माध्यम से कम परेशानी,कम समय में और कम खर्च में आप न्याय प्राप्त कर सकते हैं। अगर आप कोर्ट का सहारा लेंगे तो काफी दौड़-भाग के साथ ही अधिक खर्च और काफी लम्बे समय के बाद न्याय प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने बताया की कोर्ट के कार्रवाई के दौरान हर स्तर पर पैसे देने पड़ते थे। मुंशी जब पेपर बनाते थे तब भी पैसा देना होता था। जब वकील का हस्ताक्षर होता था तब भी पैसे की माँग की जाती थी।इसके बाद बहस के समय भी पैसा देना होता था।कोर्ट में बहस के दौरान जो भी बातें होती थी वो समझ में नहीं आती थी। बहस के बाद वकील से पुछने पर जानकारी मिलती थी।कार्रवाई के दौरान जो भी कागजात होते थे ,वो वकील और मुंशी के पास ही होती थी।कागजात में लिखें कुछ विवरण तो हमें समझ में आ जाती है। लेकिन उसमें लगाये गए धारा के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं होती। वकील से पूछने कोई ख़ास जानकारी नहीं प्राप्त होती थी।मुकदमा के दौरान हर माह केस का खर्च हजार रूपये लगता है।शुरुआत में हर माह जाने के बाद कुछ समय बाद दो या तीन महीने में वकील को पैसे दे देते थे। लेकिन ऐसी परिस्थिति में पैसा देर से मिलने पर वकील द्वारा कोर्ट बुलाया जाता था की आपको भी सुनवाई के दौरान उपस्थित होना जरुरी है। जबकि ऐसा कुछ नहीं होता था। पैसों के कारण हमें उपस्थित रहने की जरूरत बताई जाती थी।वकील और मुंशी के द्वारा बस पैसों की उगाही की जाती है।अगर वकील के मन मुताबिक़ पैसे नहीं दिये जाते हैं,तो काम में देरी की जाती है। जिसके कारण सुनवाई दूसरे पहर में होती थी। कोर्ट और घर की दूरी 30 किलोमीटर की होती थी। ऐसे में हमें रात भर वहीँ रुकना पड़ता था। इसमें परेशानी और खर्च दोनों ही बढ़ जाता है। इसके साथ ही उस दिन कोई कमाई भी नहीं हो पाती है