उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से रमज़ान अली की बातचीत मोबाइल वाणी के माध्यम से मोहम्मद फ़राहन से हुई। फ़राहन कहते है कि मायके के जमीन में बहन को हिस्सा नहीं मिलना चाहिए। उन्हें उनके पति के घर में हिस्सा मिलना चाहिए। अगर बहन को दिया जाएगा मायके में तो भाई बहन में विवाद होगा और स्थिति बदल जायेगी

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलायें बहुत ही मेहनत से पूरा समय खेती , पशु और घर को संभालती हैं। लेकिन जमीन पर उनका नाम नहीं होता है। जिसके कारण उन्हें कई लाभों से वंचित होना पड़ता है। वो लोन नहीं ले पाती ना ही उन्हें योजनाओं का लाभ मिल पाता है। अगर महिलाओं को जमीन पर हक दिए जाते तो वो योजना का लाभ ले सकती है। खेती में नए तरीके भी अपना सकती है। इसके साथ ही अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर सकती हैं। जो जमीन संभालती हैं उनका भी हक जमीन पर होना चाहिए

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि जमीन सिर्फ प्रॉपटी नहीं होती है, बल्कि पहचान होती है। एक महिला दिन रात काम करती है। अपने परिवार बच्चों का ख्याल रखती है। उसका काम भी जमीन से जुड़ा हुआ होता है। लेकिन उस महिला के नाम पर जमीन नहीं होती है। ये सिर्फ गलत नहीं नाइंसाफी है। कानून कहता है की बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं दोनों को समान अधिकार दिया गया है। लेकिन बेटियों को कहा जाता है की तुम्हें शादी में दे दिया गया। लेकिन शादी तो कोई डील नहीं है। बेटी कोई बोझ नहीं है। जब महिला के नाम जमीन होती है. तो वो अपने निर्णय खुद लेती हैं और अपने भविष्य को भी सुरक्षित करती है

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से विजय पाल चौधरी पैंतालीस साल कहते हैं कि महिलाओं को अभी भी अपने अधिकारों की पुर्ण जानकारी नहीं है। जैसे की अगर महिला को राशन कार्ड ही बनवाना हो तो उन्हें यह नहीं पता होता है कि ये कैसे बनेगा कहाँ जाना होगा। इसलिए महिलाओं को जागरूक करना हर विषय पर बहुत जरुरी है

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से 50 वर्षीय अरविन्द श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि अधिकतर महिलाएँ अपना समय कृषि कार्यों में देती है और महिलाओं को यह हक़ नहीं होता है कि उनका अधिकार जमीन में होना चाहिए। जहाँ पट्टे की बात होती है तो पुरुष अपने नाम ही पट्टा करवाता है। पैतृक संपत्ति में भी बेटों को अधिक हिस्सा दिया जाता है। लड़ाई लड़ने के बाद ही कुछ प्रतिशत महिलाओं को जमीन में मालिकाना हक़ मिला हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में न के बराबर महिलाओं के नाम जमीन है वहीं शहरी क्षेत्रों में लोग महिलाओं के नाम जमीन खरीदते है क्योंकि उसमें स्टाम्प छूट मिलता है। लेकिन जमीन में नाम के बावजूद महिलाओं को मालिकाना हक़ समाज द्वारा नहीं दिया जाता है। महिलाओं को उनके नाम जमीन रहने पर भी उनका स्वामित्व नहीं मिलता है।

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से प्रीति सिंह मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि महिलाओं को जमीन का पैतृिक संपत्ति और स्वयं खरीदी या उपहार में मिली संपत्ति दोनों पर अधिकार लड़कों के बराबर होना चाहिए। जो हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 से मिला है। जिसके तहत बेटियों को भी बेटों जितना हक होना चाहिए। पति की मृत्यु पर पत्नी को गुजारा भत्ता और संपत्ति का हिस्सा मिलना चाहिए। आजकल लोग विधवा महिला को संपत्ति में हिस्सा नहीं देना चाहते हैं। तलाक के बाद भी गुजारा भत्ता और संपत्ति का हिस्सा मिल सकता है। लेकिन ये कोर्ट के अनुसार होता है। लेकिन विधवा महिलाओं को तो मिलना ही चाहिए।

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से 45 वर्षीय विजय पाल चौधरी मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि सन् 1956 अनुसार विधवा महिलाओं को भी जमीनी अधिकार मिलना चाहिए। अक्सर होता है कि पति के नाम जमीन होता है जिससे विधवा महिला को जमीन को लेकर परेशानी होती है। अगर ये संयुक्त होती ,पति पत्नी के नाम होती तो विधवा महिलाओं को समस्याएँ नहीं झेलनी होती। महिलाओं को जमीनी अधिकार मिलना चाहिए। अगर महिलाओं को जमीनी अधिकार नहीं मिलता तो उन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि महिलाओं का भूमि अधिकार केवल कागज़ का सवाल नहीं बल्कि सोच बदलने का सवाल है। अगर महिला को जमीन का अधिकार देते है तो हम उसे कह रहे है होते है कि वो खुद अपना निर्णय ले सकती है और उनपर भरोसा दिखाते है। इससे महिला का आत्मविश्वास बढ़ता है और उनका सम्मान बढ़ता है। परिवार मज़बूत होता है। अगर लोगों के पास जमीन है तो महिला का भी नाम जमीन में जोड़िये। क्योंकि अगर महिला मज़बूत होती है तो देश मज़बूत होता है

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलायें सुबह से शाम तक खेती संभालती है, बीज लगाना पानी देना फसल का ध्यान रखना सब कुछ करती हैं। लेकिन जब कागज देखे जाते है, तो जमीन का मालिक कोई और होता है। ये सिर्फ नाइंसाफी नहीं बल्कि महिला की मेहनत को नजरअंदाज करना है। अगर जमीन उसके नाम हो तो वो नए तरीके अपना सकती है। खेती में सुधार ला सकती है और अपने परिवार को और आगे बढ़ा सकती है। जो खेत संभालती है उसका नाम भी जमीन पर होना ही चाहिए

उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि आज के समय में बेटियां भी काम कर आत्मनिर्भर हैं और अपने अभिभावक की जिम्मेदारी उठाती है। लेकिन फिर भी विरासत देने के समय बेटियों को याद नहीं किया जाता है। बेटी का हक भाई के बराबर होता है। फिर भी बेटी से सिर्फ साइन करवा लिया जाता है। जिसके बाद जमीन भाई की हो जाती है। बेटी को कहा जाता है की तुम्हें तो शादी में दे दिया गया है। लेकिन इससे बेटी का हक कम या खत्म नहीं हो जाता है। बेटियों को ना मायके में ना ससुराल में विरासत में कोई हक दिया जाता है।अगर हम सच में बराबरी चाहते हैं, तो हमें अपने मन में बदलाव लाना होगा