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बाल विवाह मुक्त झारखंड अभियान की पिछली कड़ी में बात की गई थी, समाज से बाल विवाह कि कुरीति को खत्म करने से जुड़ी कुछ क़ानूनी प्रावधानों के बारे में।आज यानी पांचवी कड़ी में बात की जा रही है, समाज से बाल विवाह को खत्म करने के लिए समाज में अलग-अलग पदों में काम कर रहे व्यक्तियों (स्टेकहोल्डर) की भूमिकाओं के बारे में जिसे बता रहे हैं, स्वयं सेवी संसथान प्लान इंडिया के राज्य प्रबंधक अनूप जी। उन्होंने बताया कि सभी स्टेकहोल्डर को अपनी जिम्मेदारियों को अच्छे से निभाना चाहिए।इसमें सबसे अहम् भूमिका bdo की होती है। वे निश्चित करते हैं की बाल विवाह रोकथाम कानून का पालन प्रखंड स्तर पर कितना बेहतर तरीके से हो रहा है।साथ ही योजनाओं को लाभ लोगों को कितना बेहतर तरीके से दिया जा रहा है।
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बाल विवाह मुक्त झारखंड अभियान की चौथी कड़ी में यह बताया गया कि समाज से बाल विवाह की रीती को ख़त्म करने के लिए सरकार कई सारी कानून बनाई है। पर कई बार लोगों तक इसकी सम्पूर्ण जानकारियां ना होने की वजह से लोग इसका लाभ नहीं उठा पातें हैं।इसी विषय पर स्वयं सेवी संस्थान प्लान इंडिया के कार्यक्रम समन्वयक राजीव सिन्हा जी ने बताया कि हमारे देश में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 नामक कानून बनाई गई है।और साथ ही इसी अधिनियम के आधार पर झारखंड सरकार के नियमावली भी है जिसे झारखण्ड बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2015 कहा जाता है ये दोनों झारखण्ड में बाल विवाह को रोकने के लिए बनाई गई है।बाल विवाह में दण्ड का भी प्रवधान है।
बाल विवाह मुक्त झारखण्ड अभियान की तीसरी कड़ी में यह बताया गया कि बाल विवाह करने से क्या -क्या नुक्सान हो सकता है। जिस तरह गरीबी की दुस्चक्र से निकलना मुश्किल होता है उसी तरह बाल विवाह के दुस्चक्र से भी निकलना मुश्किल होता है। और इससे पूरी एक पीढ़ी प्रभावित होती है। जब एक कम उम्र का व्यक्ति जिसका शारीरिक और मानसिक विकास अधूरा हो वो शादी के बंधन में बंध जाता है तो उसके बच्चे कैसे स्वस्थ हो सकते हैं । इतनी छोटी उम्र में तो शरीर गर्भधारण के लायक होता ही नहीं है तभी तो इस तरह की परेशानियां होती हैं । राजस्थान और बिहार के बाद सबसे ज्यादा बाल विवाह का चलन झारखण्ड में ही है। बचपन में बाल विवाह होने के कारण बच्चे सही से पढाई नहीं कर पाते जिसके कारण उनका मानसिक विकास पूरी तरह से नहीं हो पाता है। वे कई तरह की जानकारी और ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। इतना ही नहीं पढ़े लिखे न होने के कारण उन्हें अच्छी नौकरी भी नहीं मिल पाती। बाल विवाह के बाद कई सारे स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं। जैसे की प्रजनन से जुडी समस्या,कम उम्र में शादी मतलब कच्ची उम्र में गर्भधारण,जिसके कारण न सिर्फ माँ के जान को खतरा होता है बल्कि बच्चे भी अस्वस्थ रहते हैं और कई बार मृत भी पैदा होते हैं। और ये एक बहुत बड़ी वजह है की हमारे राज्य में मातृ शिशु दर बहुत ही ऊँचा है। बाल विवाह का दुस्चक्र इसी तरह चलता रहता है पर इसे तोड़ना मुश्किल है नामुमकिन नहीं। इसके लिए जरुरी है बाल विवाह के दूरगामी परिणामों को समझना और समाधान के तरफ कुछ ठोस कदम उठाना
बाल विवाह मुक्त झारखण्ड अभियान की दूसरी कड़ी में यह बताया गया कि बाल विवाह का मतलब 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के की शादी कराना एक अपराध है। क्योकि इस उम्र में बच्चो का शारीरिक और मानसिक विकास पूरा नहीं हो पता है।साथ ही इस कड़ी में यह भी बताया गया कि झारखण्ड में 32% से अधिक लड़कों की शादी कम उम्र में ही करा दी जाती है। यह एक चिंता का विषय है। बाल विवाह का कारण केवल जानकारी का अभाव ही नहीं बल्कि गरीबी और दहेज़ भी एक मुख्य कारण है।लोग यह मानतें हैं की बेटियों की शादी कम उम्र में करने पर अधिक दहेज़ नहीं देना पड़ेगा।लेकिन कम उम्र में शादी करा देने पर वे परिवार नियोजन के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं और इस स्थिति में उन्हें कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है।कम उम्र और जानकारी के अभाव में ही बच्चे होने का खतरा बन जाता है।दोस्तों आपके हिसाब से समाज में आज भी आखिर बाल विवाह क्यों किया जाता है।
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Oct. 31, 2017, 6:18 p.m. | Tags: autopub
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Nov. 4, 2017, 6:05 p.m. | Tags: autopub