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हरियाणा राज्य से विकास ने बताया कि इन्होने श्रमिक वाणी पर प्रसारित कार्यक्रम 'भावनाओं का भंवर'सुना था जिसमें चुप्पी को कैसे तोड़ें विषय पर जानकारियां दी गई थी।मानसिक तनाव एक बहुत ही गंभीर समस्या है।मन में जो भी विचार आते हैं वो किसी दूसरे व्यक्ति के साथ जरूर साझा करें।अपने किसी विश्वसनीय दोस्त,साथी या रिश्तेदार से मन की बातें साझा करनी चाहिए।सम्माज में मानसिक बीमारी को लेकर जागरूकता नही है। लोग मानसिक रोगी को पागल कहते हैं और मजाक उड़ाते हैं।यह बहुत गलत है। हमें समाज में मानसिक रोग के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी।
कहते हैं कि पूंजीवाद केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सोच है — एक ऐसा दृष्टिकोण जो इंसान को इंसान से तोड़कर उसे केवल उपभोक्ता के रूप में देखना चाहता है। इस व्यवस्था का मूल स्वभाव ही इतना व्यक्तिकेंद्रित होता है कि वह हर स्तर पर 'फूट डालो, राज करो' की नीति को आत्मसात कर लेता है। यह नीति अब केवल सत्ता की राजनीति, सरकारों की रणनीति या कॉरपोरेट दिग्गजों के एजेंडे तक सीमित नहीं रही। अब यह हमारे सबसे निजी, सबसे मानवीय दायरे — हमारे घरों, मोहल्लों और सोसाइटीज़ तक पहुँच चुकी है। कभी जो मोहल्ले आपसी सहयोग और सामाजिकता के केंद्र हुआ करते थे, आज वहाँ अपार्टमेंट की दीवारें केवल ईंट-पत्थर की नहीं, बल्कि मन की दूरियों की बाड़ बन चुकी हैं। आज पड़ोसी एक-दूसरे के नाम नहीं जानते, और सोसाइटी मीटिंग्स में मुद्दे कम और मतभेद ज़्यादा दिखाई देते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था ने न सिर्फ ज़रूरतों को बाज़ार बना दिया, बल्कि रिश्तों को भी एक सौदे में तब्दील कर दिया। और इस पूरे बदलाव की जड़ में है — वही पुरानी, आजमाई हुई नीति: फूट डालो, राज करो। इस लेख में हम एक ग़ाज़िआबाद जिले की एक प्रतिष्ठित हाउसिंग सोसायटी 'दिव्यांश ओनिक्स' की कहानी के बहाने इस सच्चाई से रूबरू होने की कोशिश करेंगे — कि कैसे एक आर्थिक सोच ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को चुपचाप छिन्न-भिन्न कर दिया है। पढ़िए और सोचिए — क्या हम अब भी एक समाज हैं, या केवल साथ खड़े मगर अलग-थलग लोग?
क्या आपने कभी ऐसा कुछ महसूस किया है या ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं जिन्होंने ऐसी स्थिति का सामना किया है ?ऐसी परिस्थिति में आपको क्या लगता है कि आपके सबसे नज़दीकी रिश्तों को बनाएं रखने में और किस तरह का मदद उपयोगी हो सकते हैं
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