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एक समय था जब घर में बुजुर्गों का रहना शान समझा जाता था। बेटे-बेटियाँ चाहे कितने भी बड़े हो जाए , परन्तु माता पिता के सामने अपने को बच्चा ही समझते थे। समाज की ऊँच नीच, जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्तों का अनुभव घर के बुजुर्गों के पास खूब होता था।लेकिन आज के गलाघोंट प्रतियोगिता के दौर में और जवानी के जोश में भरी आज की नई पीढ़ी बुजुर्गों के स्नेह, करुणा और उनकी भावनाओं को भूलने लगे है। नयी पीढ़ी नये सोच के घोड़े पर सवार होकर जल्द से जल्द आसमान को छूना चाहती है। परिणामस्वरूप वो बुजुर्गों का सम्मान करना ही भूल रही हैं।क्या आज के बच्चे अपने माता-पिता की इच्छाएँ पूरी कर पाते हैं, जिस तरह से माता पिता इनकी करते हैं? जिस प्यार, विश्वास, सम्मान और अधिकार के साथ बच्चे मातापिता के घर में रहते हैं, क्या उसी प्यार, विश्वास, सम्मान और अधिकार के साथ वृद्धावस्था में माता-पिता भी बच्चों के घर में रह पाते हैं? क्या हम अपने बुजुर्गों को सहेज कर नहीं रख सकते? क्या वे हमारे मार्ग दर्शक नहीं बन सकते?
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मोहदा धनबाद से बीरबल महतो ने मोबाईल वाणी के माध्यम से बताया कि वर्त्तमान समय में जीवन भाग -दौड़ से भरी हुई है,इसमें सड़क दुर्घटना आय दिन देखने को मिलती है।अपने सुख -सुविधाओं को ध्यान में रख कर लोगों ने ,यातायात के साधनों को अपनाया है।लापरवाही और असावधानी के कारण सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है।गाड़ी चलाते समय नशा का सेवन,फोन पर बातें करना तथा गाड़ियों का ओवरलोड होना,दुर्घटना के मुख्य कारण हैं।जहाँ फ़ोन पे बात करने से ध्यान बट जाता है ,वहीं ओवर लोड गाड़ी असंतुलित हो जाती है ,जो दुर्घटनाओं को अंजाम देते हैं।कुछ चालक यातायात नियमों का पालन नही करते हैं ,जिस वजह से सड़क हादसों में वृद्धि हुई है।प्रशासन को चाहिए कि उन सभी पर कठोर कार्यवाही करे जो ,शराब पी कर गाड़ी चलते हैं,फ़ोन पर बात करते हैं ,ओवरलोड गाड़ी चलाते हैं और यातायात नियमों का पालन नहीं करते हैं।साथ ही बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने वालों और नाबालिक चालकों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए।जब तक इन लापरवाह लोगों पर सख्त कार्यवाही नहीं होगी और यातायात नियमों को कठोरता से लागू नहीं किया जायेगा ,सड़क दुर्घटनाओं को रोकना असंभव है।
