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एक समय था जब घर में बुजुर्गों का रहना शान समझा जाता था। बेटे-बेटियाँ चाहे कितने भी बड़े हो जाए , परन्तु माता पिता के सामने अपने को बच्चा ही समझते थे। समाज की ऊँच नीच, जीवन के टेढ़े मेढ़े रास्तों का अनुभव घर के बुजुर्गों के पास खूब होता था।लेकिन आज के गलाघोंट प्रतियोगिता के दौर में और जवानी के जोश में भरी आज की नई पीढ़ी बुजुर्गों के स्नेह, करुणा और उनकी भावनाओं को भूलने लगे है। नयी पीढ़ी नये सोच के घोड़े पर सवार होकर जल्द से जल्द आसमान को छूना चाहती है। परिणामस्वरूप वो बुजुर्गों का सम्मान करना ही भूल रही हैं।क्या आज के बच्चे अपने माता-पिता की इच्छाएँ पूरी कर पाते हैं, जिस तरह से माता पिता इनकी करते हैं? जिस प्यार, विश्वास, सम्मान और अधिकार के साथ बच्चे मातापिता के घर में रहते हैं, क्या उसी प्यार, विश्वास, सम्मान और अधिकार के साथ वृद्धावस्था में माता-पिता भी बच्चों के घर में रह पाते हैं? क्या हम अपने बुजुर्गों को सहेज कर नहीं रख सकते? क्या वे हमारे मार्ग दर्शक नहीं बन सकते?
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