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प्लान इंडिया,चेतना विकास,नव भारत जाग्रति केंद्र,यूनिसेफ,scpcr और मोबाइल वाणी के साझा प्रयास से बाल विवाह मुक्त झारखण्ड अभियान पिछले कुछ दिनों से चल रहा था। जिसमे कई श्रोताओ ने अपनी भागीदारी निभाई। सभी श्रोताओ के विचारो को सुन कर दस लक्की विजेताओं के नाम घोषणा किया गया जिन्हे मिलेगा पचास रूपए का मुफ्त मोबाइल रिचार्ज।
हम सभी एक लिंगभेदी मानसिकता वाले समाज में जी रहे है जहाँ आज भी लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है। यहाँ लड़की के रूप में पैदा होने के बाद एक औरत के रूप में जिंदा रहना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है। "आज के ज़माने की नयी तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है अब गर्भ में बेटी है या बेटा यह पता करने के लिए कि किसी ज्योतिष या बाबा के पास नहीं जाना पड़ता है, इसके लिए अस्पताल और डाक्टर हैं जिनके पास आधुनिक मशीनें है जिनसे भ्रूण का लिंग बताने में कभी चूक नहीं होती है। आज इस नयी तकनीक के जरिये अजन्मे बच्चे की लिंग जांच करवा कर कन्या भ्रूण को गर्भ में ही मार देने को बहुत आसान बना दिया है।और यही वजह है की आज हमारे देश में लिंगानुपात निरंतर बढ़ता जा रहा है। दोस्तों सरकार ने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कई सारी योजनायें और नियम भी बनाये है फिर भी लोग बेटा-बेटी में फर्क करते है , आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या यह भी एक लिंगानुपात का कारण है ? और अगर यही स्थिति रही तो हमारे समाज में इसका क्या प्रभाव अड़ेगा ? क्या ये लोगो में जागरूकता के आभाव के कारण हो रहा है ? आखिर लोग बेटे की चाह में कबतक कन्या भ्रूण हत्या करेंगे ? आखिर लोगो की यह गलत धारणा कब खत्म होगी ? इसको रोकने लिए सरकार के साथ-साथ हमे भी और क्या करना चाहिए।ताकि हमारे देश में सामान लिंगानुपात रहे।"
प्लान इंडिया,चेतना विकास,नव भारत जाग्रति केंद्र,यूनिसेफ,scpcr और मोबाइल वाणी के साझा प्रयास से बाल विवाह मुक्त झारखण्ड अभियान की बारहवीं और अंतिम कड़ी में आइये हम सुनते हैं बाल विवाह से जुडी कहानी "बबली का सफर" दोस्तों पिछली कड़ी में हमसे सुना था कि कैसे बबली के माता -पिता ने बबली को स्कूल भेजना शुरू किया।दोस्तों बारहवीं कड़ी में हम सुनेंगे "17 वर्षीय पिंकी प्रमाणिक की सफलता की सच्ची कहानी" जिसमे पिंकी ने बताया, कि 2016 में दसवीं कक्षा पास करने के बाद इनके माता-पिता इन्हे आगे की पढ़ाई करने को मना कर दिए। और पिंकी की शादी कराने के लिए लड़का देखना शुरू कर दिए क्योंकि पढ़ाई कराने के लिए पिंकी के घरवालों के पास पैसा नहीं था। कुछ दिनों के बाद पिंकी अपने गांव की सेविका दीदी से मिली और अपनी आपबीती बताई। सेविका दीदी पिंकी को संभव टीम की ट्रैनिंग में आने को कहा और वंहा की दीदियों से मिलाया। सीडीपीओं दीदी के द्वारा पत्र लिखकर शिक्षा विभाग को सौंपा गया और पिंकी की पढ़ाई को पूरा कराने को कहा गया। आज पिंकी कस्तुरवा विधालय में नामांकन करा कर अपनी पढाई पूरी कर रही हैं। साथियों यदि आपके आस-पास भी पिंकी प्रमाणिक की तरह कोई घटना घटित हुई है, तो अपने विचारों के साथ-साथ अपना अनुभव मोबाइल वाणी के साथ जरूर साझा करें।
श्रोताओं, झारखण्ड एक जनजातीय बहुल राज्य है और यहां पर वभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न जाती और समुदाय के लोग निवास करते हैं। और अगर हम बात करें यहां पर बोली जाने वाली स्थानीय भाषाओं की तो यहां पर भिन्न भिन्न तरह की भाषाएँ प्रचलित हैं जिसमे से कुछ मुख्य भाषाएँ हैं नागपुरी या सादरी ,मुंडारी, खड़िया, उराँव, सदानी,खोरठा आदि। लेकिन अब ये भाषाएँ धीरे -धीरे हमारे राज्य से विलुप्त होती जा रही है।श्रोताओं, आज भी कई ऐसे गाँव है,जहाँ के लोगों को झारखण्डी भाषाओं के आलावा और कोई भाषा नहीं आती है। बावजूद इसके सरकार झारखण्डी भाषाओं को अनदेखी कर रही है इसके पीछे क्या कारण है ? आपको नहीं लगता कि झारखण्ड की भाषाओँ को बचाने के लिए सरकार को अपने स्तर से कोई पहल करनी चाहिए ? आखिर क्या कारण है की आज की युवा पीढ़ी झारखंड की भाषाओँ को भूलते जा रही है ? अगर यहाँ की ये स्थानीय भाषाएँ विलुप्त हो जाएँगी तो यहाँ के लोगों के जन-जीवन पर इसका क्या असर पड़ेगा ? क्या आपको नहीं लगता की स्कूलों में भी झारखण्डी भाषाओँ की पढ़ाई होनी चाहिए ? ताकि आने वाली युवा पीढ़ी को भी इन भाषाओँ का ज्ञान हो? साथ ही यहां के कई क्षेत्रों के लोग सिर्फ क्षेत्रीय भाषा ही बोल पाते हैं जिससे उन्हें कई तरह के दिक्क्तों का सामना पड़ता है, ऐसे में इसके लिए क्या वैकल्पि व्यवस्था होनी चाहिए ? सभी को इस भाषा का ज्ञान हो इसके लिए सरकार के साथ-साथ लोगों को क्या करना चाहिए ?जिससे लोग अपनी मातृ भाषा को बचाये रख सकें ?आखिर इन झारखंड की भाषाओँ को विलुप्त होने से कैसे रोका जा सकता है।
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