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झारखंड के आदिवासियों का सबसे महत्वपूर्ण पर्वो में से एक टुसू पर्व है। यह पर्व सर्दियों में फसल कटने के बाद पौष के महीने में मनाया जाता है।यह अत्यंत ही रंगीन और जीवन से परिपूर्ण त्यौहार है। मकर संक्राति के अवसर पर मनाये जाने वाले इस त्यौहार के दिन पूरा आदिवासी समुदाय अपने नाच-गानों और मनसा देवी तथा अन्य पारंपरिक देवी देवताओं की पूजा से माहौल को आनंद और भक्ति से परिपूर्ण कर देते हैं . इस पर्व का समापन मकर संक्राति के दिन बडे़ भव्य तरीके से मूर्ति को स्थानीय नदी में प्रवाहित कर किया जाता है। परन्तु जिस रफ़्तार से हमारी आज की पीढ़ी आगे बढ़ रही है , उसमे में वो अपने परम्पराओं को भी उतनी ही तेज़ी से भूलती जा रही है। और टुशु पर्व भी उन से एक है। श्रोताओं, क्या आज भी आपके क्षेत्र में इस त्यौहार को इतने उत्साह के साथ मनाया जाता है...? क्या आज की नई पीढ़ी टुसु पर्व के महत्व के बारे में जानती है...? क्या आपके परिवार के बुजुर्ग नई पीढ़ी को इस पर्व से अवगत कराते है...? इस पर्व का अस्तित्व बनाएं रखने के लिए सरकार की ओर से किस तरह के प्रयास किए जा रहे हैं...? आखिर क्यों टुसु पर्व को समाज में विलुप्त होता जा रहा है...?समाज में टुसु पर्व को कायम रखने के लिए सरकार के साथ-साथ आम जनता की भी क्या-क्या भूमिका होनी चाहिए...?
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