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अधिकांश व्यक्तिगत पट्टे पुरुषों के नाम पर होते हैं. सामुदायिक अधिकारों में भी महिलाओं को भी कम प्रतिनिधित्व दिया जाता है. इसके चलते महिलाएं केवल खेत मजदूर बनकर रह जाती हैं. महिलाओं को इसका नुकसान यह होता है कि बैंक, बीमा तथा दूसरी सरकारी सहायता का लाभ नहीं उठा पाती है, जो उनके लिए चलाई जा रही हैं.

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झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग जिला से राजकुमार ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि एसिड हमले की व्यापक घटना,दहेज हत्याएं,कन्या भ्रूण हत्या,ऑनर किलिंग,कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, इत्यादि इक्कीसवीं सदी में भी महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक बुराईयों और चुनौतियों के संदर्भ में मात्र कुछ उदाहरण है। भारत में कई दुर्भाग्यपूर्ण मामलों में धार्मिक परंपराएं, व्यक्तिगत कानून और अन्य सांस्कृतिक धारणाएं अक्सर भारतीय संविधान द्वारा महिलाओं को प्रदान की गई सुरक्षा के विरुद्ध कार्य करती है।

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आपदा राहत के दौरान भी महिलाओं की स्थिति चुनौतीपूर्ण रहती है। राहत शिविरों में कई बार अकेली महिलाओं, विधवाओं या महिला-प्रधान परिवारों की जरूरतें प्राथमिकता में नहीं आतीं। तब तक आप हमें बताइए कि , *--- जब किसी महिला के नाम पर घर या खेत होता है, तो परिवार या समाज में उसे देखने का नज़रिया किस तरह से बदलता है? *--- आपके हिसाब से एक गरीब परिवार, जिसके पास ज़मीन तो है पर कागज नहीं, उसे अपनी सुरक्षा के लिए सबसे पहले क्या कदम उठाना चाहिए?"? *--- "सिर्फ 'रहने के लिए छत होना' और उस छत का 'कानूनी मालिक होना'—इन दोनों स्थितियों में आप एक महिला की सुरक्षा और आत्मविश्वास में क्या अंतर देखते हैं?"