झारखण्ड राज्य के बोकारो जिला से किशोर मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले हानि और चुनौतियों के बारे में सामूहिक चर्चा कर के समाधान निकाल सकते हैं।वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन की मार सभी को सहन करना पड़ रहा है।सभी ग्रामीणों को मिल कर इस मुसीबत का सामना करना होगा। इसके लिए पंचायत की बैठकों में विशेषकर ग्राम सभा की शामिल होना गाँव के विकास योजनाओं के उचित किणन्वयन के लिए स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए बहुत ही जरूरी है। यह सीधे तौर पर लोकतंत्र को मजबूत करता है। विकास कार्यों में पारदर्शिता लाता है। सरकारी बजट के सही उपयोग को सुनिश्चित करता है और निवासियों को अपने प्रतिनिधियों को सवाल पूछने पर अवसर देता है
झारखण्ड राज्य के जमशेदपुर से मधु ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि कृषि पर जलवायु परिवर्तन का सीधा और गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिसमें मानसून की अनिश्चितता, अत्यधिक तापमान, सूखा और बाढ़ जैसी स्थितियां प्रमुख हैं। इसके परिणामस्वरूप फसलों की उत्पादकता में कमी, पोषक तत्वों में गिरावट, कीटों के प्रकोप में वृद्धि और पशुधन के स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है, जिससे किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है। ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 के अनुसार, भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में शामिल है। जलवायु की बदलती परिस्थितियां कृषि को सबसे अधिक प्रभावित कर रहीं हैं क्योंकि लम्बे समय में ये मौसमी कारक जैसे तापमान, वर्षा, आर्द्रता आदि पर निर्भर करती है। अतः इस लेख में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि जलवायु परिवर्तन कृषि को कैसे प्रभावित करता है।
इस आख़िरी कड़ी में पानी बचाने और ज़मीन को सँभालने के आसान तरीकों पर बात होती है। खेती और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की समझ इस एपिसोड का मुख्य संदेश है |
इस एपिसोड में बारिश न होने और फिर अचानक ज़्यादा होने से फसल को होने वाले नुकसान की बात है। मौसम की मार और उससे जूझते किसान की असली परेशानी यहाँ दिखाई देती है।
इस कड़ी में बदलते मौसम की बात होती है और उसका खेती पर पड़ने वाला असर सामने आता है। किसान नई परिस्थितियों में अपनी फसल को कैसे सँभालने की कोशिश कर रहे हैं, यही इस कहानी की शुरुआत है।
यह ऑडियो श्रृंखला पानी, मौसम और खेती से जुड़ी रोज़मर्रा की सच्ची बातों पर आधारित है। इसमें बदलते मौसम का खेती और ज़मीन पर असर, पानी की कमी और उसे बचाने के आसान तरीकों की चर्चा है।
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जंगल में आग लगने से जीव जंतु के साथ पर्यावरण की भी भारी क्षति होती है :मुकेश महतो
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शुरुआती दौर में मनुष्य प्रकृति के वास्तविक रुप के प्रति आकृषित होता है। उसे निस्वार्थ भावना से संजोता है। परन्तु जब तक उसे अपने आर्य से नहीं जोड़ता तब तक उसके प्रति समर्पण का भाव कमतर होता है।

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Jan. 31, 2026, 11:25 a.m. | Tags: autopub