झारखंड आदिवासी संथाल समिति विष्णुगढ़ प्रखंड इकाई के तत्वाधान में कुसुमभा पंचायत के करारी बहाटांड परिसर में सोहराय पर्व का शुभारंभ किया गया।

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झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि एसएलआईसी दलित समुदाय के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक प्रणाली का उपयोग करता है। दलित समर्थक सरकारी नीतियों और योजनाओ का निर्माण ऐतिहासिक कानूनी निर्णयों के कारण बढ़ते दबाव का परिणाम है। दलित आबादी को अक्सर शारीरिक श्रम और सफाई आदि जैसे - मानव मल, पशु शव आदि का निपटान करने के लिए मजबूर किया जाता है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले से महत्वपूर्ण परिणाम सामने आया हैं। जिसमें न्यायालय ने सरकार को दिल्ली में शीवर कर्मचारियों की सुरक्षा स्थितियों में सुधार करने का निर्देश दिया है। हालाँकि इस मामले का दलित समुदाय पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। यह भी निर्देश दिया गया कि राज्य को आपातकालीन आधार पर सीवर सफाई के लिए व्यक्तियों को रोजगार के पूरी तरह से समाप्त करने का लक्ष्य पूरी तरह से रखना चाहिए।

विष्णुगढ़ प्रखंड के बनासो पंचायत अंतर्गत बिलंडी बिरहोर टोला में आदिम जनजाति के बीच प्रखंड विकास पदाधिकारी अखिलेश कुमार के द्वारा कम्बल वितरण किया गया इस अवसर पर अभय कुमार करण यादव मुखिया चंद्रशेखर पटेल समेत कई लोग मौजूदथे।

जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ती में अधिकार को लेकर एक अहम फैसला देते हुए कहा कि केवल लिंग के आधार पर महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हक से वंचित नहीं किया जा सकता है.

विष्णुगढ़ प्रखंड मुख्यालय परिसर में एक महत्वपूर्ण बैठक किया गया इस बैठक की अध्यक्षता उत्तम कुमार महतो ने किया संचालन कपिल देव चौधरी ने किया। 2 नवंबर संत कोलंबस मैदान में महारैली का आयोजन किया गया जिसमें भारी संख्या में पहुंचने का अपील किया गया सभी पंचायत से लोग पहुंचकर सात मील से एक साथ जाने का भी बात हुई बैठक में सुशील कुमार महतो हिरामन महतो दामोदर महतो भूपेंद्र महतो तारकेश्वर महतो समेत के लोक मौजूद थे।

विष्णुगढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा प्रखंड कमेटी के द्वारा झामुमो कार्यालय परिसर में दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन पर शोक सभा का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रखंड अध्यक्ष कपिल देव चौधरी ने किया एवं संचालन संजय प्रजापति ने किया।

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समाज कि लड़ाई लड़ने वाले लोगों के आदर्श कितने खोखले और सतही हैं, कि जिसे बनाने में उनकी सालों की मेहनत लगी होती है, उसे यह लोग छोटे से फाएदे के लिए कैसे खत्म करते हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति ने इस तरह काम किया हो, नेताओं द्वारा तो अक्सर ही यह किया जाता रहा है। हरियाणा के ऐसे ही एक नेता के लिए ‘आया राम गया राम का’ जुमला तक बन चुका है। दोस्तों आप इस मसले पर क्या सोचते हैं? आपको क्या लगता है कि हमें अपने हक की लड़ाई कैसे लड़नी चाहिए, क्या इसके लिए किसी की जरूरत है जो रास्ता दिखाने का काम करे? आप इस तरह की घटनाओं को किस तरह से देखते हैं, इस मसले पर आप क्या सोचते हैं?

भारत में जहां 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों में एक तरफ राजनीतिक दल हैं जो सत्ता में आने के लिए मतदाताओं से उनका जीवन बेहतर बनाने के तमाम वादे कर रहे हैं, दूसरी तरफ मतदाता हैं जिनसे पूछा ही नहीं जा रहा है कि वास्तव में उन्हें क्या चाहिए। राजनीतिक दलों ने भले ही मतदाताओं को उनके हाल पर छोड़ दिया हो लेकिन अलग-अलग समुदायो से आने वाले महिला समूहों ने गांव, जिला और राज्य स्तर पर चुनाव में भाग ले रहे राजनीतिर दलों के साथ साझा करने के लिए घोषणापत्र तैयार किया है। इन समूहों में घुमंतू जनजातियों की महिलाओं से लेकर गन्ना काटने वालों सहित, छोटे सामाजिक और श्रमिक समूह मौजूदा चुनाव लड़ रहे राजनेताओं और पार्टियों के सामने अपनी मांगों का घोषणा पत्र पेश कर रहे हैं। क्या है उनकी मांगे ? जानने के लिए इस ऑडियो को सुने