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कोविशील्ड बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की स्वीकारोकती के बाद सवाल उठता है, कि भारत की जांच एजेंसियां क्या कर रही थीं? इतनी जल्दबाजी मंजूरी देने के क्या कारण था, क्या उन्होंने किसी दवाब का सामना करना पड़ रहा था, या फिर केवल भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला है। जिसके लिए फार्मा कंपनियां अक्सर कटघरे में रहती हैं? मसला केवल कोविशील्ड का नहीं है, फार्मा कंपनियों को लेकर अक्सर शिकायतें आती रहती हैं, उसके बाद भी जांच एजेंसियां कोई ठोस कारवाई क्यों नहीं करती हैं?

यहां जननी सुरक्षा योजना में घटते आधार का मतलब है सरकारी संस्था हो या प्राइवेट जननी सुरक्षा को लेकर कई प्रश्न उठना लाजिमी हो गया है। बताते चले की सरकारी अस्पतालों में सही ढंग से न तो उपचार संभव हो पता है और ना प्राइवेट में रूपों की बर्बादी होती दिख रही है जिससे लोगों में परेशानी हद से ज्यादा देखी जा रही है साथ ही जितना लाभ मिलता है उससे अधिक खर्च होती है जिससे लोग परेशान नजर आ रहे हैं सरकारी डॉक्टर शरीर में हाथ लगाना भी नहीं जानता सारे टेस्ट करवाए जाते हैं और प्रसव के समय गर्मियों के द्वारा पैसे लूट जाते हैं जिसका कई बार विरोध भी हुआ है।

कोई भी राजनीतिक दल हो उसके प्रमुख लोगों को जेल में डाल देने से समान अवसर कैसे हो गये, या फिर चुनाव के समय किसी भी दल के बैंक खातों को फ्रीज कर देने के बाद कैसी समानता? आसान शब्दों में कहें तो यह अधिनायकवाद है, जहां शासन और सत्ता का हर अंग और कर्तव्य केवल एक व्यक्ति, एक दल, एक विचारधारा, तक सीमित हो जाता है। और उसका समर्थन करने वालों को केवल सत्ता ही सर्वोपरी लगती है। इसको लागू करने वाला दल देश, देशभक्ति के नाम पर सबको एक ही डंडे से हांकता है, और मानता है कि जो वह कर रहा है सही है।

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