बिहार राज्य के जिला जमुई के गिद्धौर प्रखंड से रुदल पंडित मोबाइल वाणी के माध्यम से हिर्दयानन्द कुमार पंडित से बातचीत कर रहे हैं जिसमें हिर्दयानन्द पंडित जी का कहना है कि ये अमृतसर काम करने जाते हैं तो वहां उनके साथ वहाँ के स्थानीय मजदुर भी काम करते हैं। उन्हें वहाँ बिचौलिये के सहारे काम मिलता है, वहाँ के स्थानीयलोग उस फैक्ट्री में ज्यादा काम नहीं करना पसंद करते, क्यूंकि ज्यादा काम में कम पैसे से काम कराया जाता है। परन्तु प्रवासी लोग उतनी ही मजदूरी में काम कर लेते हैं, क्यूंकि उनके पास वो काम करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं होता। उनकी मज़बूरी होती है काम करना। इसलिए उन्हें वो काम करना पड़ता है। वहां उनके साथ कभी किसी तरह की मुठभेड़ हो जाती है तो आस-पास के लोग थोड़ी बहुत मदद कर देते हैं। रुदल पंडित ने यह भी जानकारी दी कि वहाँ प्रवासी लोगों के साथ किसी भी तरह की कोई लड़ाई नहीं होनी चाहिए इसके लिए सरकार से मदद की आवश्यकता है।

बिहार राज्य के नालंदा जिला के हिलसा से पंकज जी मोबाइल वाणी के माध्यम से प्रवासी मजदुर राहुल जी से बातचीत कर रहे है जिसमें राहुल जी का कहना है कि ये पिछले तीन साल से दिल्ली में काम कर रहे हैं उन्हें बिहार से बाहर जाकर काम करना पड़ता है क्यूंकि बिहार में ज्यादा फैक्टरियां नहीं है और हैं भी तो थोड़ा बहुत है और वहाँ पैसा कम दिया जाता है क्यूंकि स्थानीय लोगों को पैसे कम दिए जाते हैं और बाहर से आए लोगों को थोड़े ज्यादा पैसे दिए जाते हैं।बिहार में रोजगार के अवसर भी कम हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जब वे बिहार से बाहर काम करने जाते हैं तो वहां उन्हें ज्यादा काम दिया जाता है और पैसे कम परन्तु वहाँ के स्थानीय लोगों को ज्यादा पैसे और कम काम दिए जाते हैं।और वहां जो बाहर से कार्य के लिए लोग आते हैं,वो वहाँ के स्थानीय लोगों की तुलना में बहुत ही कम छुट्टी दी जाती हैं तथा स्थानीय लोग कम वेतन हेतु आंदोलन करते हैं।जो की बाहरी लोग नहीं करते।वहाँ के जो बॉस होते है,वो बाहरी लोगों को जब चाहे हटा सकते हैं।उन्होंने कहा कि अगर अपने ही राज्य में सरकार अधिक से अधिक फैक्ट्रियां खुलवा दे, तो किसी भी मजदुर को काम के लिए बाहर पलायन नहीं करना पड़ेगा। और वो अपने परिवार के साथ रह कर ख़ुशी ख़ुशी काम कर सकते हैं।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिद्धौरप्रखंड से रंजन कुमार मोबाइल वाणी के माध्यम से श्रमिकों के बारे में बनाडीह गांव के प्रवासी मजदुर नारायण यादव से बातचीत कर रहे है,जिसमें नारायण जी का कहना है कि ये मुंबई शहर में ऑटो चलाते हैं उनके साथ वहाँ स्थानीय मजदुर भी ऑटो चलाने का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें वहाँ ऑटो उनके मालिक के द्वारा दिया गया है,.साथ ही उन्होंने अपनी परेशानी भी हमारे सामने रखी। जैसे की भाषाओं को सुन कर,उनका जवाब नहीं दे पाना क्यूंकि मुंबई की भाषा उनके अपने गांव से बहुत ही अलग है तो उन्हें समझने में बहुत मुश्किल होती है। उन्होंने बताया कि वहां के स्थानीय लोगो को बहुत कम मात्रा में काम दी जाती है बिहार के लोगों की अपेक्षा। क्यूंकि बिहार के लोग बिना किसी हिचकिचाहट के कम पैसे में ही राजी हो जाते हैं ,जबकि वहाँ के स्थानीय लोग कम पैसे में काम नहीं करना चाहते है। इस वजह से वहां के स्थानीय लोगो को ऑटो नहीं दी जाती है । नारायण जी ने बताया कि उन्हें वहाँ अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है और वहाँ उनका अपना कोई नहीं होता। किसी बात पे बहस होने पर भी वहां उनकी कोई पक्ष नहीं लेता। स्थानीय प्रशासन तक भी वे मजदुर की अपनी बात नहीं पहुंचा पाते।नारायण यादव ने हमे यह भी बताया कि उनका सपना है कि वो काम कर वापस अपने शहर बिहार जाकर अपने बच्चो को पढ़ाना-लिखना चाहते हैं। उनका सपना पूरा करना चाहते हैं।मगर उन्होंने यह भी कहा कि अब तक उनका सपना पूरा नहीं हो पाया है। इस तरह उन्होंने हमारे बिच अपनी बात रखी।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिद्धौर प्रखंड से मोबाइल वाणी के माध्यम से संदीप कुमार से श्रमिकों के बारे में बातचीत कर रहे है,जिसमे संदीप जी का कहना है कि ये पंजाब में धागा फैक्ट्री में काम करते है और ये इन्होनें किसी दूसरे के माध्यम से खोजा। उन्होंने यह भी बताया की उन्हें वहाँ के स्थानीय लोगों की बाते समझ नहीं आती, वो उनकी बातें तो सुन लेते पर उन्हें उनका जवाब नहीं दे पाते ,इस तरह से उन लोगो को भाषाओं को लेकर बहुत परेशानी होती है। वहाँ के फैक्ट्री में वहाँ के स्थानीय लोगों को काम नहीं दी जाती क्यूंकि वो कम मजदूरी में ज्यादा काम नहीं करना चाहते। उन्हें पैसे ज्यादा चाहिए होता है साथ ही वे लोग आपस में ही दंगा फ़साद करने लग जाते है। किसी भी मुद्दे पर इस वजह से उन्हें काम नहीं दी जाती। जबकि जो वहाँ काम के सिलसिले में गए हैं उन्हें काम जल्दी मिल जाता है,क्यूंकि ये लोग कम मजदूरी में ज्यादा काम कर लेते है,क्यूंकि ये लोग उसी मकसद से गए हैं। उनका काम करना ही एक लक्ष्य रह जाता है। इसलिए ये मजदुर जैसा भी काम हो स्वीकार लेते है। वहां उनका अपना कोई नहीं होता। उन्हें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है। उनके दौरान हमें यह भी जानकारी मिली की उन मजदूरों से लगभग चौदह से पंद्रह घंटे काम करवाए जाते है और उन्हें वो काम पूरी सिद्दत से करनी पड़ती है वहाँ उन्हें उनके अनुसार रहना पड़ता है खुद को उनके इशारे पे ढलना पड़ता है।कभी वहाँ किसी भी बात पे विवाद छिड़ जाए तो वहाँ के फैक्ट्री वाले उस बात को फैक्ट्री के अंदर ही दबा कर रख लेते यही। सरकार तक उन मजदूरों की बात पहुंच ही नहीं पाती। इसी दौरान संदीप से पूछा गया की उनके साथ हो रहे दुराचार से कैसे उन्हें या उनके साथी को बचाया जाए तो उन्होंने बताया की सरकार को वैसी ही फैक्ट्रियां अपने शहर में दी जाए, ताकि हम जैसे मजदूरों को बाहर काम करने के लिए नहीं जाना पड़ेगा।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिद्धौर प्रखंड से भीम राज मोबाइल वाणी के माध्यम से श्रम के सम्मान के विषय में संतोष कुमार साह से बातचीत कर रहे है,जिसमें संतोष कुमार साह जी का कहना है कि अभी वे मुंबई में रहते हैं और कपड़े की फैक्ट्री में काम करते हैं। वहाँ के स्थानीय लोग भी उस फैक्टरी में काम करते है ।उन लोगों को सीधा मालिक के द्वारा भी काम दिया जाता है परन्तु संतोष ने बताया की उन्हें अपने मालिक के द्वारा काम दिया गया।वहाँ पलायन करते वक़्त से अब तक उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। जैसे भाषा,रहन -सहन ,वहाँ के वातावरण में खुद को ढालना इत्यादि।वहाँ के स्थानीय लोगो को काम मिलने में थोड़ी परेशानी होती है ,परन्तु पलायन किये लोगों को काम आसानी से मिल जाता है , ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि बाहर के लोग कम पैसे में ही काम करने को तैयार रहते है,जबकि वहां के स्थानीय लोग ऐसा नहीं करते है ।अनजान शहर में बाहरी लोगो को किसी भी तरह की परेशानी होती है तो वहाँ के लोग या प्रशासन उनकी किसी भी तरह से मदद नहीं करती। इस वजह से उनकी परेशानी और दुगुनी हो जाती है।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिद्धौर प्रखंड से भीम राज मोबाइल वाणी के माध्यम से श्रम के सम्मान के विषय में रतनपुर गांव के प्रभु साहू से बातचीत कर रहे है,जिसमें प्रभु जी का कहना है कि ये अभी कुछ दिन से मुंबई में रह रहे हैं और वहां काम करते हैं। उनके साथ वहाँ के स्थानीय लोग भी काम करते हैं और उन सभी लोगो को मालिक के द्वारा काम मिल जाती है। उन्हें भाषा समझने में भी परेशानी होती है क्यूंकि मुंबई वाले लोग अपनी स्थानीय भाषा प्रयोग करते है। इस वजह से उन्हें भाषा समझने में दिक्कत होती है। वहाँ के स्थानीय लोगों को काम मिलना थोड़ा कठिन होता है,क्यूंकि वे कम पैसे में ज्यादा काम नहीं करना चाहते और बाहर से गए लोग कोई भी काम पकड़ लेते। इसलिए स्थानीय लोगों को काम मिलने में मुश्किल होती है और पलायन लोगों को काम के लिए परेशानी नहीं होती है । इस तरह उन्हें प्रदेश में बहुत सी परेशानी झेलनी पड़ती है।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिद्धौर प्रखंड से रंजन कुमार मोबाइल वाणी के माध्यम से श्रम के सम्मान के विषय में बनाडीह गांव के रंजीत कुमार जी से बातचीत कर रहे है,जिसमे रंजीत जी का कहना है कि वे बंगलौर में काम करने जाते हैं और वहां बाहरी लोगों के साथ साथ स्थानीय मजदूर भी काम करने जाते हैं। वे लोग अपने काम के लिए ठेकेदार से बात करते है । उन्हें वहां के वातावरण के साथ-साथ ऐसी बहुत सी परेशानिया उठानी पड़ती है। जैसे : भाषा समझना, वहां के पर्यावरण में खुद को ढालना इत्यादि। अन्य राज्य के ठेकेदार स्थानीय लोगों को काम पर रखने से ज्यादा बिहार के लोगों को रखना पसंद करती है क्योंकि मजदूरी कम मिलती और काम ज्यादा। इसके अलावा अगर उन्हें कोई परेशानी या किसी से कोई बहस छिड़ जाए तो स्थानीय प्रशासन से भी उन्हें किसी भी तरह की कोई सहायता नहीं दी जाती।इस तरह की बहुत सी परेशानी बाहर काम करने गए लोगों को सहना पड़ता है।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिरधौर प्रखंड के बनाडीह गांव से रंजन कुमार मोबाइल वाणी के माध्यम से भरम देव पंडित से बातचीत कर रहे हैं, कि भरम देव पंडित जो की गांव बनाडीह के निवासी हैं और वो कुछ दिन पहले ही दिल्ली गए थे काम करने। वहाँ पर बहुत से लोग काम करने जाते हैं, जैसे - बंगाली , राजस्थानी , मारवाड़ी अनेक जगह के लोग। और वो वहाँ ठेकेदार के माध्यम से काम करते हैं। उन्होंने यह भी बताया की वहाँ उन्हें भाषाओं को लेकर भी बहुत परेशानी होती है उन्हें भाषा समझने में दिक्कत होती है। भरम देव पंडित ने बताया की वहाँ के स्थानीय लोगो को काम कम और मजदूरी ज्यादा दी जाती है।जबकि बाहर से पलायन लोगो से काम ज्यादा और मजदूरी कम दी जाती। उनके साथ भेद भाव की जाती है। इस तरह से बाहर से पलायन लोगों को प्रदेश में ऐसी ही बहुत सी परेशानी उठानी पड़ती है। भरम देव पंडित ने यह भी कहा की किसी बात पे बहस होने पर स्थानीय लोगो के साथ पक्षपात किया जाता है ।

बिहार राज्य के जमुई जिला के गिद्धौर प्रखंड से रंजन कुमार मोबाइल वाणी के माध्यम से गांव बानाडीह के सोनू यादव से बातचीत रहे हैं, कि सोनू जी गुजरात में काम करते थे और वहाँ उनके साथ स्थानीय मजदुर भी काम करते थे। उन्हें वहाँ काम बिचौली के द्वारा मिला था। उन्हें वहां भाषा को लेकर परेशानी होती है। वहाँ के स्थानीय लोग इनकी भाषा नहीं समझ पाते। उन्होंने बताया की वहां के स्थानीय लोगों को जल्दी काम नहीं मिलता जबकि प्रवासी लोगों को तुरंत ही मिल जाता है, ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि वहांके स्थानीय लोग कम मजदूरी में ज्यादा काम नहीं करना चाहते और दूसरी तरफ प्रवासी मजदुर जो कम पैसे में भी कोई भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया की वहाँ के फैक्ट्रियों में बिहार के लोगों को ज्यादा देर तक काम करवाए जाते हैं, और स्थानीय लोगों से नहीं। किसी भी तरह की बहस होने पर न ही वहां के लोग, न ही प्रसाशन उनकी कोई मदद करती।

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