बिहार राज्य के जमुई ज़िला के गिद्धौर प्रखंड के पटसँदा पंचायत के भोजपुरिया गांव से रंजन की बातचीत मोबाइल वाणी के माध्यम से पूर्व वार्ड पार्षद डब्लू पंडित से हुई। डब्लू पंडित कहते है कि महिलाओं के नाम भूमि मिलने से समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा। पुरुष के नाम जमीन होने से वो अपने अनुसार जमीन को रखते है। महिलाओं को भूमि का अधिकार मिलना चाहिए। समाज पुरुष महिला के मेल से चलता है। जमीन महिला को मिलने के बाद भी पुरुष का सहयोग ज़रूरी है।जमीन मिलने से समाज में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा और मानसिक बदलाव होगा। पहले से महिलाओं में बहुत सुधार हुआ है। जमीन में नाम होने से पहले के मुकाबले महिला खुद आत्मनिर्भर बन जाएगी। इससे महिला का मान सम्मान बढ़ेगा। महिला घरेलु हिंसा व प्रताड़ना से भी बचे रहेगी। महिला के पास जिम्मेदारी आ जाएगा।
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि हमारे देश में कानून तो बना हुआ है पर महिलाओं को भूमि अधिकार तब ही मिलेगा जब हम अपनी सोच बदलेंगे। केवल कानून होने से कुछ नहीं होता। कानून तब काम करता है जब घर के लोग उसे मानते है। जब बेटी का नाम जमीन पर जोड़ते है तो लोग बेटी पर भरोसा दिखाते है इससे यह होता है कि महिला के साथ पूरा परिवार बदलता है और धीरे धीरे समाज भी। जब महिला मज़बूत होती है तब देश भी मज़बूत होता है
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि अक्सर बेटियों से कहा जाता है कि जायदाद में हिस्सा छोड़ दो तो घर में शांति रहेगी पर क्या हक़ छोड़ना ही अच्छाई होती है। बेटी को भावुक कर हस्ताक्षर करवा दिया जाता है और बाद में कहा जाता है कि वो अपने मन से हिस्सा छोड़ी है।बेटी का भूमि पर उतना ही हक़ है जितना बेटे का। बेटी अपना हक़ लेती है तो वो लालची नहीं होती वो केवल बराबरी होती है। असली संस्कार ये है कि बेटियों को बिना माँगे उनका हक़ मिल जाए
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि बहुत सी महिलाओं को अत्याचार इसलिए सहना पड़ता है क्योंकि उनके पास रहने के लिए ज़मीन नहीं होता। जब महिला के पास अपनी भूमि होती है तो वो गलत के खिलाफ खड़ी हो सकती है ,वो मज़बूर नहीं रहती। जमीन ,जायदाद जिन महिलाओं के पास होता है उनके साथ हिंसा का मामला भी कम होता है। जमीन केवल कागज़ का मामला नहीं है ये महिलाओं की ज़िन्दगी बचाने का ज़रिया भी है।
बिहार राज्य के जमुई ज़िला के गिद्धौर प्रखंड से रंजन मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार तभी संभव हो सकता है जब महिलाओं के नाम से पुरुष वर्ग अपनी जमीन जायदाद का हिस्सा बना देता है। आज के समय में पुरुष महिलाओं के नाम जमीन खरीदना शुरू कर दिए है। घर का बड़ा भाई जब पत्नी के नाम जमीन खरीदना शुरू कर देते है तो उस जमीन में छोटे भाई का हिस्सा नहीं बनता है। जब से महिलाओं के नाम जमीन होने लगा है तब से महिलाओं का घर में मान सम्मान बढ़ गया है और महिलाएँ खुद को आत्मनिर्भर समझने लगी है।महिलाओं को जमीन मिलने से तलाक का मामला कम हो गया है। क्योंकि भय रहता है कि महिला के साथ दुर्व्यवहार करने पर अगर वो मायके चले जाएगी तो जमीन की हकदार महिला होगी। शिक्षित महिला जमीन से होने वाली आय का इस्तेमाल छोटे रोज़गार जैसे सिलाई ,अगरबत्ती , मोमबत्ती बनाना ,लाख की चूड़ी बनाना ,परिवार की देख रेख करना ,बच्चों की पढ़ाई करना आदि में कर रही है। अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ाने का काम कर रही है। जमीन मिलने से महिलाएँ आज के समय में आगे बढ़ गयी है। महिलाओं के नाम जमीन होना चाहिए ताकि भूमि बचा रहे। क्योंकि अक्सर पुरुष की ख़राब लत से दिक्कत आ जाती है और जमीन को बचा कर नहीं रख पाते है।
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि जब जमीन महिला के नाम होती है तो उसे सिर्फ प्रॉपर्टी नहीं मिलती सुरक्षा भी मिलती है। सिक्योरिटी मिलती है। वो बैंक से लोन ले सकती है। अपना काम शुरू कर सकती है और मुश्किल वक्त में किसी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहती। वो मुश्किल समय में अपना काम खुद कर सकती है। अपने आप को संभाल सकती है। अक्सर देखा गया है की जिनके पास अपनी जमीन होती है उन महिलाओं के साथ अत्याचार कम होता है। क्योंकि उनकी आवाज मजबूत हो पाती है वो गलत के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत कर पाती है। उन्हें पता होता है की अगर कोई मेरा साथ ना भी दे तो मेरे पास एक प्रोपर्टी है। जिसके जरिए वो अपनी जिंदगी काट सकती है। उसे एक तरह की सुरक्षा रहती है, इसलिए उसकी आवाज भी मजबूत हो जाती है। भूमि का अधिकार का मतलब है डर से आजादी और भविष्य का भरोसा
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग जिला से राजकुमार मेहता ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि विेधवाओं को अक्सर लांछित जीवन जीने और सामाजिक रूप से बहिष्कृत किए जाने का डर होता है। दृष्टि आई एस की एक रिपोर्ट बताती है कि विधवाओं को गरिमा पूूर्ण जीवन जीने से रोका जाता है और ससुराल वाले क्रूर व्यवहार करते हैं। जमीन के मालिकाना हक़ के अभाव में विधवाएं पूरी तरह आर्थिक रूप से कमजोर हो जाती हैं।एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार जमीन ना होने पर उन्हें कम मजदूरी वाले काम करने पड़ते हैं। ऐसे में बच्चों की शिक्षा एवं देखभाल मुश्किल हो जाती है
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि महिलाओं का अधिकार भविष्य के लिए भी ज़रूरी है। लड़की जब अपने अधिकार जानती है तो वो अपनी बेटी ,बहन और पूरे समाज के लिए रास्ता बनाती है। सोचिये एक ऐसा देश जहाँ महिला बिना डर के जीती हो ,बराबरी का मौका और सम्मान मिले वही देश आगे बढ़ता है। जब कोई व्यक्ति अपने घर से शुरुआत कर महिला को अधिकार देता है तो इस छोटे कदम से पूरा देश बदलता है। देश प्रगति की ओर आगे बढ़ता है। जब देश में काम करने वाले और मज़बूत ज़्यादा होंगे तब ही देश आगे बढ़ पाएगा। महिलाओं को लोग पीछे कर के देश की आधी आबादी को काम करने से बिलकुल वंचित कर देते है जो कि बहुत गलत है। अगर समाज और देश का उद्धार करना है तो सब को मज़बूत बनाना पड़ेगा और सब को काम करना होगा
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि महिलाओं का अधिकार कोई अहसान नहीं उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। परिवार ,बच्चों को संभालना ,खेत ,ऑफिस में काम करना महिला करती है लेकिन जब बारी आती है जमीन ,संपत्ति में हक़ मिलने का तो उन्हें पीछे ही रखा जाता है। महिलाओं को अपने निर्णय खुद लेने का अधिकार है।और जब महिलाओं को अधिकार देते है तो केवल महिला ही नहीं बल्कि पूरा समाज और परिवार मज़बूत बनता है। बराबरी बोलने से नहीं मानने से शुरू होती है
मध्य प्रदेश राज्य के नगर इटारसी से राकेश कुमार यादव मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि महिलाओं को ससुराल के प्रॉपर्टी में हक़ लेना चाहिए।मायके में माता पिता अपने बेटी को पढ़ाते लिखाते हैं और दहेज़ देकर शादी करते हैं और उसके बाद जमीन में भी हिस्सा देना पड़ेगा तो लोग बेटी को जन्म नहीं देने के बारे में सोचने लगेंगे।इसलिए बेटी को ससुराल में ही हक़ मिलना चाहिए।
