मंदी के मकड़जाल में फंसने वालों में केवल शहरी युवा ही नहीं हैं बल्कि ग्रामीण युवा भी हैं. केवल शहर की नामी कंपनियां ही नहीं बल्कि गांव का मनरेगा भी शामिल है. जो युवा शहरी कंपनियों से बाहर निकाल दिए गए हैं वो गांव पहुंचे हैं और यहां भी मनरेगा में उन्हें काम नहीं मिल रहा है. अगर काम मिला है तो पैसा नहीं है. विस्तार से सुनने के लिए ऑडियो पर क्लिक करें
इन दिनों देश में जो हालात हैं वो किसी से छिपे हुए नहीं है. हर जगह धरना प्रदर्शन हो रहे हैं, आंदोलन हो रहे हैं. लोगों का गुस्सा उबाल मार रहा है. सरकार के खिलाफ जन आक्रोश वाकई परेशान कर देने वाला है.लेकिन इन सबके पीछे दबाया जा रहा है देश में मंदी का मुद्दा.इस बार जनता ने हमें बताया कि कैसे मंदी के कारण ग्रामीण विकास के काम अटके हुए हैं और उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.ऑडियो पर क्लिक कर सुनें श्रोताओं की प्रतिक्रियाएँ।
श्रोताओं मंदी का मकड़जाल ऐसा है कि पलायन मजदूर को मनरेगा से भी निराशा ही हाथ लगी और वह मजदूर शहर में भी आज भी दर-दर की ठोकरें खाने को लाचा और विवश है शहर से नौकरी से छपने के बाद वह अपने गांव जब वापस पहुंचे तब वह काम की तलाश में मनरेगा का हाथ पकड़ने गया लेकिन मनरेगा में भी काम बरसों से बंद होने के कारण वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी विस्तारपूर्वक जाने के लिए ऑडियो पर क्लिक करें
सताओ मंदी का मकड़जाल ऐसा है कि गांवों से पलायन कर शहर गए मजदूर आज दर दर की ठोकर खाने को मजबूर है शहर में नौकरी से निकाले जाने के बाद वापस अपने गांव पहुंच रहे हैं इस उम्मीद के साथ कि अपने गांव कस्बे में मनरेगा जैसी योजनाओं में उन्हें काम मिलेगा लेकिन यहां भी उन्हें निराशा मिलती है ऐसी स्थिति में उन्हें अपना और अपने परिवार के भरण-पोषण करने में भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है विस्तारपूर्वक सुनने के लिए ऑडियो पर करें
मुंगेर से विपिन कुमार की रिपोर्ट
मंदी के मकड़जाल में फंसने वालों में केवल शहरी युवा ही नहीं हैं बल्कि ग्रामीण युवा भी हैं. केवल शहर की नामी कंपनियां ही नहीं बल्कि गांव का मनरेगा भी शामिल है. जो युवा शहरी कंपनियों से बाहर निकाल दिए गए हैं वो गांव पहुंचे हैं और यहां भी मनरेगा में उन्हें काम नहीं मिल रहा है. अगर काम मिला है तो पैसा नहीं है... ज्यादा जानकारी के लिए अभी क्लिक करें और सुनें....
