यह भावनाओं के आहत होने का दौर है पता नहीं चलता कब किसकी कौन सी भावना आहत हो जाए इन खिलाड़ियों के ऐसे करने के पीछे का एक कारण बाहुबली नेता के सहयोगी का खेल संघ के अध्यक्ष पद पर चुना जाना है क्या देश की राजनीतिक हस्तांतरण में खेलों में हस्तक्षेप किस रूप में देखते हैं कहां तक जायज लगता है और जिन ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चा जिस तरीके से अपने खेलों के प्रति अपने मेहनत करते हैं उनका खेलों में राजनीतिकरण किस रूप में देखते हैं साथ ही वर्तमान में कुश्ती संघ में हुए चुनाव के बाद में कुछ दिनों बाद उसको निरस्त करना कहां तक सही लगता है क्या चुनाव होने ही और फिर उसे निरस्त करना फिर इसका क्या उचित देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर दो बार धरना प्रदर्शन देने के बाद भी इन राजनेताओं को सरकार के संरक्षण मौन के चलते अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है क्या यह न्याय कितना और लंबा होता जाएगा और अभी हाल ही में इन्होंने अपने पदक को वापस लेने की बात के साथ ही वापस कर दिए हैं पर यह भी किस तरीके से हम देखते हैं।विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।
