जिले में आकस्मिक सेवा के लिये सरकार के द्वारा 78 एम्बुलेन्स दिया गया है। इसका संचालन एनजीओ के द्वारा किया जाता है। यह सेवा मुफ्त है। मगर इस एम्बुलेन्स में अधिकांश एम्बुलेन्स में इमरजेंसी दवा का किट नहीं होना और कई में चालू स्थिति में ब्लड प्रेशर मशीन का नहीं होना व एमुलाइजर का खराब रहने सहित समय पर एम्बुलेन्स नहीं मिलने के मामला उजागर हुआ। बताते हैं कि जबसे एम्बुलेन्स की मुफ्त सेवा जिले में सरकार के द्वारा एनजीओ के माध्यम से शुरू हुई है तब से कभी भी सीएस या जिला स्वास्थ्य समिति से संचालित एम्बुलेन्स की जांच नहीं हुई। न तो फिटनेस देखी गयी और न एम्बुलेन्स की आवश्यक दवा किट सहित उपकरण की पड़ताल की गयी है। नतीजतन एम्बुलेन्स संचालक मनमाने ढंग से संचालन करते रहे। बीच में तो ऐसी स्थिति बन गयी थी कि इमरजेंसी मरीज को ले जा रहे एम्बुलेन्स का डीजल बीच रास्ते में समाप्त हो जाता था और फिर डीजल के लिये आधा से एक घण्टा तक इंतजार करना पड़ता था। नतीजतन मरीज के अभिभावकों को अपना पैसे से डीजल लेना पड़ता था। बार बार शिकायत पर भी कोई सुनवाई न तो सीएस करते थे और न डीपीएम क्योंकि मामला पटना से जुड़ा था। इधर सरकार ने जिले को 58 नया एम्बुलेन्स दिया। जिसमें 24 वेंटिलेटर युक्त है। 22 पुराने एम्बुलेन्स को ठीक ठाक कर चलाना शुरू हुआ मगर विभगीय उदासीनता के कारण अधिकांश एम्बुलेन्स में दवा का किट नहीं था। एमुलाइजन भी पुराने एम्बुलेन्स का खराब था। सभी एम्बुलेन्स के ड्राइवर, टेक्नीशियन का प्रमाण पत्र और अद्यतन स्थिति की मांग चिकित्सा प्रभारियों से की है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही एम्बुलेन्स के भाड़ा का भुगतान होने की बात कही गयी है। सीएस डॉ अंजनी कुमार ने डीपीएम को एम्बुलेन्स पर निगरानी और हर तीन महीने पर इसकी जांच कराते रहने का निर्देश दिया है।
