इस समय गर्मी बहुत अधिक पड़ती है और लंबे समय तक होती है। उतर बिहार में गर्मियों में तापमान 45 डिग्री के पार चला जाता है। ऐसे मौंसम में पशु दबाव की स्थिति में आ जाते हैं। इस दबाव की स्थिति का पशुओं की पाचन प्रणाली और दूध उत्पादन क्षमता पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। केविके प्रमुख डॉ. एके सिंह ने बताया कि इस मौसम में नवजात पशुओं की देखभाल में अपनायी गयी तनिक सी भी असावधानी उनकी भविष्य की शारीरिक वृद्धि, स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधी क्षमता और उत्पादन क्षमता पर स्थायी कुप्रभाव डाल सकती है। गर्मी में पशुपालन करते समय ध्यान न देने पर पशु के सूखा चारा खाने की मात्रा में 10 से 30 प्रतिशत और दूध उत्पादन क्षमता में 10 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। साथ ही साथ अधिक गर्मी के कारण पैदा हुए आक्सीकरण तनाव की वजह से पशुओं की बीमारियों से लड़ने की अंदरूनी क्षमता पर बुरा असर पडता है और आगे आने वाले बरसात के मौसम में वे विभिन्न बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। जिससे उनकी उत्पादन व प्रजनन क्षमता में गिरावट आ जाती है। इस मौसम में सांड़ों की प्रजनन क्षमता पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। सांड़ों में वीर्य उत्पादन व गुणवत्ता में कमी आती है। भैंसों में यह दुष्प्रभाव अधिक देखने को मिलता है। उनके शरीर का काला रंग तथा बालों की कमी उष्मा को अधिक अवषोषित करती है। इसके अतिरिक्ति भैंसों में पसीने की ग्रन्थियाँ गायों की अपेक्षा बहुत कम होती है, जिसके कारण भैंसों को शरीर से उष्मा निकालने में अधिक कठिनाई होती है। ऐसे गरम वातावरण में मादा पशुओं का मद चक्कर का काल लम्बा हो जाता है और मदावस्था का काल एवं उग्रता दोनों ही काफी मद्विम पड़ जाते हैं तथा पशुओं में अमादकता की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। बताया कि ग्रीष्म ऋतु में होने वाले इन दुष्प्रभावों को कम करने के लिए पशुओं के लिए आवास हेतु साफ-सुथरी व हवादार पशुशाला होनी चाहिए जिसका फर्श पक्का व फिसलन रहित हो तथा मूत्र व पानी की निकासी हेतु ढलान हो। पशुशाला की छत उष्मा की कुचालक हो ताकि गर्मियों में अत्यधिक गरम न हो। इसके लिए एस्बेस्ट्स सीट उपयोग में लायी जा सकती है। अधिक गर्मी के दिनों में छत पर 4 से 6 इंच मोटी घास-फूस की परत या छप्पर ड़ाल देना चाहिए। ये परत उष्मा अवरोधक का कार्य करती है जिसके कारण पशुशाला के अन्दर का तापमान कम बना रहता है। सूर्य की रोशनी को परावर्तन करने हेतु पशुशाला की छत पर सफेद रंग करना या चमकीली एल्युमिनियम शीट लगाना भी लाभप्रद पाया गया है। पशुशाला की छत की ऊँचाई कम से कम 10 फुट होनी आवश्यक है ताकि हवा का समुचित संचार पशुशाला में हो सके तथा छत की तपन से भी पशु बच सके। पशुशाला की खिड़कियाँ व दरवाजों व अन्य खुली जगहों पर जहाँ से तेज गरम हवा आती हो, बोरी या टाट आदि टांग कर पानी का छिड़काव कर देना चाहिए। पशुशाला में पंखों का होना भी लाभप्रद होता है। अतः सम्भव हो तो उसकी भी व्यवस्था होनी चाहिए।
