बाहर के मंडियों से आया आलू स्थानीय किसानों के लिए मुसीबत बन गया है। अन्य प्रदेशों से आ रहे आलू की कीमत कम है। कारोबारी मुनाफा कमा रहे हैं और किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। जिससे आलू की कीमत में गिरावट ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। जैसे किसानों की कमर ही तोड़ दी है। किसानों ने बताया कि प्रति कटठा आलू की फसल के उत्पादन में करीबन दो हजार से 2600 रुपये की लागत आती है और उससे निकले फसल के उपज से सिर्फ दो हजार से 2400 रुपये की मिल रहे हैं। तीन महीने तक खेतों में मेहनत का किसानों को कोई मोल नहीं मिल पा रहा है। बताया कि सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अन्य प्रदेशों के व्यापारी बिहार में आलू खरीदने नहीं आ रहे हैं। इसकी वजह से भी स्थानीय किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यदि जल्दी ही आलू की कीमत नहीं संभली तो बिहार के आलू उत्पादकों को करोड़ों की चपत लग सकती है। किसान बताते हैं कि जिस समय आलू की रोपाई हुई थी। उस समय आलू की कीमत 15 से 18 सौ रुपये प्रति क्विंटल थी। मौसम की बेरुखी का फसल पर भी असर पड़ा। प्रति कटठे में सिर्फ दो क्विंटल आलू की पैदावार हुई है, जबकि प्रति कटठा आलू के उत्पादन में करीबन दो हजार रुपये लागत लगती है। ऐसी स्थिति में किसानों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ रहा है। कहा कि सरकार एक ओर किसानों की आय दोगुनी करने की बात कह रही है और दूसरी ओर हमें पैदावार का आधा खर्च भी नहीं मिल पा रहा है। इस बार ना तो किसानों को व्यापारी मिल रहा है और ना ही कोल्ड स्टोर के मालिक आलू रखने को तैयार हो रहे हैं। अब खेत पर आलू निकालने के लिए किसानों को मजदूर भी नहीं मिल रहे हैं। किसानों का कहना है कि केरल के तर्ज पर बिहार में भी हरी साग सब्जियों एवं आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाये। दूसरी ओर पहले फसल क्षति का मुआवजा भी किसानों को दिया जाता था, लेकिन अब सरकार ने वह भी बंद कर दिया है। इससे कि अब किसान भुखमरी के कगार पर पहुंच गये हैं।
