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उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई जिला से मोबाइल वाणी संवाददाता अनुराग गुप्ता ने रामु वाजपेयी से बातचीत की। जिसमें उन्होंने जानकारी दी कि महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति पर पूरा अधिकार मिलना चाहिए। इसके साथ ही जब हम कोई भी जमीन खरीदते हैं, तो यह ध्यान रखना चाहिए कि हमें अपने नाम पर जमीन लेने के बजाय अपनी पत्नी को प्राथमिकता देनी चाहिए।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से पहले महिलाओं की स्थिति बहुत खराब थी। महिलाओं को कई बंदिशों के साथ रहना पड़ता था। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद बहुत बदलाव आया और इसमें कई महिलाएं भी सामने आई। जिसका असर महिलाओं पर पड़ा और तब से धीरे-धीरे निरंतर बदलाव हो रहा है। शहरों में स्थिति बहुत बेहतर है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में अब भी बदलाव आना बाकी है, जो भविष्य में जरूर देखने को मिलेगा। घर चलाने में महिला की महत्वपूर्ण भूमिका है, तो जब महिला सशक्त हो जाती है और महिला के पास आय का स्रोत होता है। जब वह आगे बढ़ती है, तो कहीं न कहीं पारिवारिक जीवन खुशहाल होगा। पुरुषों के लिए बहुत आसान हो जाएगा, क्योंकि परिवार की आय का स्रोत बढ़ेगा और पुरुषों की जिम्मेदारी कम होगी। जिससे बच्चे वहाँ का पालन-पोषण बहुत बेहतर तरीके से होगा।

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उत्तरप्रदेश राज्य के हरदोई जिला से बुद्धसेन सोनी ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि लैंगिक असमानता हमारे बीच एक कड़ी बनी हुई है, जब कि महिलाओं और पुरुषों को समानता का अधिकार है। इन सब के बावजूद भी महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। उन्हें पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दिया जाता है। इसके लिए हमें शिक्षा और जागरूकता कि आवश्यकता है। लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए सरकार के साथ साथ सामाजिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए

उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई जिला से मोबाइल वाणी संवाददाता बुध सेन सोनी ने बताया कि हमें यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए कि महिलाओं को भूमि का अधिकार मिले। सामाजिक संस्थानों द्वारा महिलाओं में शिक्षा और जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए । विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।

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उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई जिला से मोबाइल वाणी संवाददाता अनुराग गुप्ता ने जानकारी दी कि खेती किसानी से लेकर अंतरिक्ष प्रोग्राम में अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर इतिहास रच रही महिलाओं के इस दौर में लैंगिक असमानता किसी अभिशाप से कम नहीं है, सरकार के प्रयासों से महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में हिस्सेदारी तो मिल रही हैं लेकिन वह आज भी पुरुषों के मुकाबले खुद को पीछे पा रही हैं इसकी मुख्य वजह पुरुष सत्ता का एकाधिकार होना है । हरदोई जनपद में इसकी स्थिति पर बात की जाए तो हरदोई जिले में लैंगिक असमानता चरम पर हैं। नगरीय इलाकों में भी विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं को चाहकर भी वह अधिकार नहीं मिल पा रहे जो वह चाहती हैं, ग्रामीणों क्षेत्रो की स्थिति तो बेहद भयाभह है। हरदोई जनपद में सरकार मिशन शक्ति के तहत जहां महिलाओं को उनके कानूनी अधिकार बताकर सुरक्षा के प्रति जागरूक कर रही हैं तो विभिन्न सरकार विभाग भी अपने स्तर पर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं । इसके अलावा तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं भी महिलाओं के उत्थान की दिशा में प्रयासरत हैं। दोस्तों, जिन महिलाओं को समानता का अधिकार मिल रहा हैं उनकी संख्या बेहद कम हैं । सरकार को और हम सभी को महिलाओं के साथ साथ पुरुषों को भी लैंगिक समानता को लेकर जागरूक करना पड़ेगा, क्योंकि महिलाओं को समानता का अधिकार तभी मिल पायेगा जब समाज के पुरूष इस दिशा में आगे आकर चली आ रही सामाजिक व धार्मिक परम्पराओं को त्याग कर महिलाओं को अपने समकक्ष खड़ा होने की हिम्मत जुटा पाएंगे । समाज के पुरुषों को यह पहल करनी ही चाहिए ताकि महिलाओं को समानता का अधिकार मिल सके । जो देश व समाज के हित के लिए बेहद जरूरी भी हैं।

उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई जिला से अनुराग गुप्ता ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जबाबदेह होती हैं, ऐसे में लोकतांत्रिक तरीके से सत्तासीन हुई सरकार को बनाये गए नियमों के तहत ही काम करना चाहिए ।पक्ष-विपक्ष कार्यक्रम के ताजा एपिसोड कड़ी संख्या 71 में 'लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं और सत्ता पक्ष की हठ' पर आधारित रिपोर्ट में बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया गया। लोकतंत्र में कार्यपालिका, न्यायपालिका व व्यस्थापिका को संविधान द्वारा अधिकार देकर उनको संचालित करने के लिए नियम तय किये गए हैं । लेकिन पिछली सरकार में जिस तरह नियमों की अनदेखी कर काम किया गया, उससे न सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी विरोध के स्वर सुनाई दिए थे । कोई भी संस्थान का अपना कोई मत नहीं होना चाहिए, संस्थान को चाहिए कि उसके लिए जो नियम बनाये गए या तय किये गए उनके अनुसार ही काम करना चाहिए । अब एक नई सरकार का गठन हो चुका है, इस सरकार को अपनी पिछली गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए, बल्कि सरकार चलाये के जो नियम बनाये गए उनके अनुसार काम करना चाहिए, ताकि विपक्ष के साथ साथ देश की जनता को भी लगे कि उसने लोकतांत्रिक तरीके से जो सरकार बनाई है वह अपने निजी हित को किनारे कर जनहित में काम कर रही हैं । सत्ता पक्ष की हठ से नई परम्पराओं का श्रीगणेश होना देश के लोकतंत्र व जनता के हित मे नहीं हैं । क्योंकि लोकतंत्र में कब सत्ता परिवर्तन हो जाये यह जनता तय करती हैं, और जब सत्ता दूसरी विचारधारा के हाथ में होती है तो वह भी अपनी नीतियों के हिसाब से काम करेगी बनाये गए नियमों के हिसाब से नहीं । इसलिए लोकतांत्रिक संस्थानो को हठ त्याग कर नई परम्पराओं को शुरू करने से बचना चाहिए और नियमों के हिसाब से ही काम करना चाहिए। विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।

उत्तरप्रदेश राज्य के हरदोई ज़िला से अनुराग ,मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि भारतीय समाज में लैंगिक असमानता के पीछे धार्मिक व सामाजिक परम्पराएं हैं, जिनका पालन हमारा समाज सदियों से करता आ रहा है । लड़कियों की अपेक्षा लड़को की शिक्षा पर हमारे समाज द्वारा अभी तक ध्यान दिया जाता था, शिक्षा के मामले में लड़कियां पीछे रह जाती थी, या उन्हें जान बूझकर पीछे रखा जाता था । इसके पीछे भारतीय समाज की दकियानूसी सोच ही थी। अक्सर हम सुनते आए थे कि लड़की है बड़ी होकर शादी के बाद घर में चूल्हा चौका ही करना हैं। इसी सोच के चलते लड़कियां शिक्षा से वंचित रही, लिहाजा उनमें जागरूकता की कमी हो गई। हालांकि आज के बदलते समय में लड़कियों को अब शिक्षा से बड़े पैमाने पर जोड़ा जा रहा हैं। लेकिन जागरूकता की कमी के चलते महिलाएं अपने अधिकार व समानता से वंचित रह गई हैं। समाज में जो मानदंड बनाये गए उसके अनुसार महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहना चाहिए। समाज को चाहिए कि वह दकियानूसी सोच से बाहर निकले साथ ही लड़कियों को शत प्रतिशत शिक्षा के साथ अन्य अधिकार भी मुहैया कराए। लैंगिक असमानता न केवल महिलाओं के विकास में बाधा पहुंचाती हैं, बल्कि राष्ट्र के आर्थिक व सामाजिक विकास को भी प्रभावित करती हैं। स्त्रियों को समाज में उचित स्थान न मिले तो देश पिछड़ेपन का शिकार हो सकता हैं। लैंगिक समानता के लिए ग्रामीण इलाकों में परम्पराओं में बदलाव की नितांत आवश्यकता है।

उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई जिला से मोबाइल वाणी संवाददाता अनुराग गुप्ता ने जानकारी दी कि आज के आधुनिक युग में जब हम लड़के और लड़कियों में भेदभाव नहीं करने का दावा करते हैं, ऐसे में भूमि अधिकार महिलाओं के लिए भी उतने ही जरूरी हैं, जितने की पुरुषों के लिए । आज हम जिस समाज में रहते हैं यहां अचल संपत्ति के रूप में जमीन अधिकार की बात सामने आती है, लेकिन जमीन अधिकार बड़े अनुपात में आज भी पुरुषों के पास ही होते हैं । हालांकि इस बदलते समाज में हम लड़के और लड़कियों में भेदभाव नहीं करने का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत इससे जुदा है । दरअसल हमारा भारत गांव में बसता है, और गांव में आज भी शिक्षा की भारी कमी है। हालांकि सरकार और सामाजिक संस्थाओं के द्वारा बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं । लेकिन महिलाओं को अभी भी ग्रामीण इलाकों में पुरुषों के बराबर हक नहीं मिल पा रहा । महिलाओं को भूमि अधिकार में जो चुनौतियां सामने आ रही है, उनमें धार्मिक और सामाजिक परंपराएं मुख्य हैं। परिवार का मार्गदर्शन करने वाले बड़े बुजुर्ग आज भी भूमि अधिकार के मामले में अपने परिवार के पुरुषों को ही चुनते हैं । उन्हें लगता है कि पुरुष को मिले अपने इस अधिकार से वह जमीन का संरक्षण बेहतर तरीके से कर सकते हैं । लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर महिलाओं को भूमि अधिकार मिले तो वह पुरुषों के मुकाबले और बेहतर तरीके से जमीन का संरक्षण कर सकती हैं। एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद में 70 फ़ीसदी भूमि अधिकार पुरुषों के हाथ में है, तो सिर्फ 30 फ़ीसदी भूमि अधिकार ही महिलाओं को मिले हैं । यह अनुपात कहीं से भी लैंगिक समानता के अनुरूप नहीं है। महिलाओं को भूमि अधिकार मिलना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि तभी महिलाएं सशक्त बन सकती हैं, जो की महिला सशक्तिकरण के दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा ।