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-दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी डेयरी कंपनी में सरकारी दमन के बावजूद हड़ताल जारी - आईएमएफ के अनुसार बांग्लादेश प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत को पीछे छोड़ देगा
पिछले सप्ताह के शुरुआत में संसद ने श्रम कानूनों से सम्बन्धित तीन नई नियमावलियाँ प्रस्तुत किए. इनमें पिछले वर्ष पारित किये गए नवीन श्रम नियम/क़ानून भी शामिल थे. इस नियमावली में श्रमिकों से सम्बन्धित सम्मिलित नियम-क़ानून भारत के सारे श्रमिकों के मौजूदा अधिकारों और पात्रताओं को सिरे से बदलने जा हैं. ये तीनों नियम कार्य-स्थलों से सम्बन्धित श्रमिकों के स्वास्थ्य एवम सुरक्षा, औद्योगिक सम्बन्धों और सामाजिक सुरक्षा के बारे में हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि इन तीनों कानूनों को विपक्ष के उन अधिकाँश सांसदों की अनुपस्थिति में जितनी तेज़ी से हो सकता था उतनी तेज़ी से पारित करवाया गया जो इन श्रम कानूनों का जम कर विरोध कर रहे थे. इन विधेयकों ने पिछले साल के अपने संस्करणों का स्थान ले लिया। जिस तरह से जल्दीबाज़ी में इन कानूनों को पारित करवाया गया उसको देखते हुए इस बात की बहुत अधिक सम्भावना है कि इन कानूनों को बनाने वाले लोगों के पास इनको पढ़ने और इनमे किए गए बदलावों की समीक्षा करने के लिए पर्याप्त समय मिला होगा।
केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को प्रवासी श्रमिकों के कार्यस्थल पर सुरक्षित वापसी को ले कर दिशा निर्देश जारी किए . गुरुवार को केन्द्र सरकार ने प्रवासी श्रमिकों कार्य-स्थलों पर सुरक्षित वापसी तथा उनके कल्याण के सन्दर्भ में सम्बंधित राज्य सरकारों विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया. श्रम-कानूनों को ठीक से लागू करने श्रमिकों को उचित सुविधाएँ उपलब्ध करवा पाने में असफ़ल रहने के बाद इसने गंतव्य स्थलों वाले राज्यों की सरकारों को यह सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए कि प्रवासी श्रमिकों को सैनीटाइजर्स, साबुन और फेस मास्क्स की नियमित उपलब्धता के साथ_साथ निश्चित अंतराल पर उनकी चिकित्सकीय जाँच भी सुनिश्चित की जाए. इस सन्दर्भ में इसने यह भी निर्देशित किया की नियोक्ताओं को श्रमिकों को आवासीय सुविधाएँ तथा एक समय का यातायात शुल्क भी प्रदान करने हेतु प्रोत्साहित किया जाए. इसके साथ ही उनकी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि वो प्रवासी श्रमिकों के बच्चों का पंजीकरण/नामांकन विद्यालयों में कराएँ। प्रवासी श्रमिकों के श्रोत-राज्यों को यह सलाह दी गयी है कि वो राज्य से बाहर जाने वाले सभी श्रमिकों से सम्बन्धित आँकड़े निर्धारित प्रारूप में एकत्रित करें। इन आँकड़ों में श्रमिकों के नाम, उम्र, फ़ोन नंबर, गंतव्य स्थल का पता, व्यवसाय/आजीविका और आधार संख्या से सम्बन्धित सूचनाएँ सम्मिलित हैं. श्रोत एवं गंतव्य से सम्बन्धित राज्य सरकारें सामाजिक सुरक्षा की विभिन्न योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना इत्यादि में प्रवासी श्रमिकों के पंजीकरण हेतु संयुक्त रूप से उत्तरदायी हैं. विश्व का सबसे बड़ा रोज़गार कार्यक्रम सिकुड़ता जा रहा है. अपने गृह राज्यों को लौटने वाले उन प्रवासियों के लिए नरेगा अत्यधिक दबाव के कारण संकट में आती प्रतीत हो रही है जिनको गाँवों में आजीविका हेतु पर्याप्त कार्य की आवश्यकता है. इस वर्ष लगभग एक चौथाई समय में जॉब-कार्ड्स ज़ारी करने के साथ यह योजना प्रति प्रति न्यूनतम १०० दिनों के लिए कार्य के अवसर उपलब्ध करवाने का आश्वासन देती है परन्तु वास्तविकता यह है कि इस वर्ष यह पिछले वर्ष के दौरान ३४ दिनों तक कार्य उपलब्ध कराने के अपने औसत आँकड़े से भी पीछे रह गयी है. अप्रैल माह से ले कर अब तक 8.2 करोड़ श्रमिकों ने इस योजना के अन्तर्गत कुछ कार्य मिलने की बात कही है परन्तु इनमें से अधिकांश लोगों को कुछ ही दिनों के लिए कार्य मिल पाया है. साथ ही, इसमें मिलने वाली Rs.१९४/दिन की मज़दूरी प्रवासी श्रमिकों के रूप में अर्जित की जाने वाली 400 रुपये/दिन की मज़दूरी से लगभग आधी है. सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अर्थशास्त्रियों ने ऐसे में यह माँग करना प्रारम्भ कर दिया है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कार्य की बढ़ती माँग के सन्दर्भ में पर्याप्त उपाय करने की आवश्यकता है. EPFO में 0.35 प्रतिशत की कटौती. शुक्रवार को भविष्य निधि ने घोषणा की कि इसके 5 करोड़ खाता धारकों को उनकी जमा राशि पर मिलने वाले 8.50 प्रतिशत वार्षिक घोषित ब्याज पर 0.35 प्रतिशत की कटौती की जाएगी. 2019-20 की अवधि के लिए आने वाले कुछ सप्ताहों मिलने वाले भुगतान की ब्याज-दर अब 8.15 प्रतिशत होगी जबकि शेष 0.35 प्रतिशत ब्याज का भुगतान दिसंबर 2020 में किये जाने की बात कही गयी है. यह 2018-19 में किये गए 8.65% के भुगतान में हुई अतिरिक्त कमी है और साथ ही साथ इक्विटी निवेश से होने वाली आय में अस्थिरता का एक परिणाम भी है. ब्याज में की गयी इस कमी से सभी खाताधारियों सेवानिवृत्ति के सन्दर्भ में की गयी बचतों पर नकारात्मक असर पड़ेगा जिसकी आलोचना केंद्रीय श्रमिक संघों यथा भारतीय मज़दूर संघ और AITUC द्वारा की जा रही है.
लॉकडाउन के बाद अपने गृह राज्यों में तीन करोड़ आंतरिक प्रवासियों के साथ, सवाल यह है कि उनमें से कितने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जीविकाएँ पाएंगी और कितने लोग वापस आएंगे और कितने वेतन पर आएंगे? इस महामारी दौर में भारत के साथ-साथ बांग्लादेश से आए प्रवासियों को रोजी-रोटी का भारी नुकसान हुआ है। प्रवासी कामगारों के लिए एक प्रमुख गंतव्य ईरान की... खाड़ी देश है।भारत और बांग्लादेश कुछ लोगों को वापस लाने में मदद कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अक्टूबर में विधानसभा चुनावों के लिए कमर कसते हुए, बिहार सरकार ने कई वर्षों से मतदाता सूची से हटने वाले प्रवासियों को पंजीकृत करने के लिए एक अभियान शुरू किया है। ऑडियो पर क्लिक कर सुनें पूरी ख़बर...
रफ़ी की डायरी कार्यक्रम की कड़ी संख्या 18 में आप सुनेंगे की क्या नियम कानून नेता निति खपते मजदूरों को जीवन की मूल्य सुविधाएं उपलब्ध करा पाएगा खबर को विस्तार पूर्वक सुनने के लिए ऑडियो पर करें क्लिक शुक्रिया,धन्यवाद।
तमिलनाडु के एक कतायी कारख़ाने या स्पिनिंग मिल से 35 बच्चों को मुक्त कराए जाने के बाद से वस्त्र-कारख़ानों में बाल-श्रम की समस्या से निबटने के प्रयास बढ़ गए हैं। इस सप्ताहांत शुक्रवार को केंद्रीय व्यापार संघों के आह्वान पर लगभग 6 लाख आशा कार्यकर्त्रियों द्वारा एक राष्ट्र-व्यापी हड़ताल करने की अपेक्षा थी। 10 केन्द्रीय व्यापार संघों द्वारा जारी एक वक्तव्य के अनुसार कार्यकर्त्रियाँ इस बात को ले कर विरोध प्रदर्शन कर रहीं हैं कि सरकार कोविड-19 के विरुद्ध लड़ायी में उनका पर्याप्त तथा अपेक्षित सहयोग नही कर रही है। इसमें सुरक्षा उपकरणों का अभाव, समय पर वेतन प्रदान नही करने तथा जोखिम भत्तों का भुगतान नही करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। भारत में सख़्त लॉकडाउन के कारण घर लौट चुके प्रवासी श्रमिकों के कारण देश के कुछ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों जैसे खनन, विनिर्माण और खुदरा क्षेत्रों में श्रमिकों की अत्यधिक कमी चिंताजनक परिस्थितियाँ निर्मित होने लगी हैं। इण्डिया रेटिंग़्स एंड रीसर्च के अनुसार यदि आगामी महीनों में कर्मचारी-श्रमिक काम पर वापस नही लौटते हैं तो विनिर्माण और उत्पादन क्षेत्र को श्रमिकों की कमी के कारण मज़दूरी-वेतन में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है।
