हम भारत के नागरिक हैं, लेकिन यह हैसियत सरकार रिकॉग्नाइज करती है या नहीं हम नहीं जानते। प्रधानमंत्री जी नें यह कह कर कि कोरोना वायरस अभी भी खतरनाक है और हमें सावधानी बरतनी चाहिए, लेकिन उनकी सावधानी रखने की चेतावनी किसी भी शहर में किसी भी श्रेणी के नागरिक नहीं मान रहे। दूसरी तरफ एम्स के निदेशक डॉक्टर गुलेरिया जिनकी सारी चेतावनी अब तक सही उतरी हैं, का कहना है कि नवंबर, 20 और फरवरी, 21 मैं कोरोना वायरस का दूसरा विस्फोट होगा जो अगली अगस्त, 21 तक असर डालेगा, यही चेतावनी दूसरे विशेषज्ञ भी दे रहे हैं, पर सरकार अनलॉकडाउन तीन की तैयारी कर रही है, जिसमें सिनेमा हॉल रेस्टोरेंट्स और होटल के साथ बार भी खुल जाएंगे। क्या हमें यह मान लेना चाहिए की सरकार यह मान रही है कि अन लॉकडाउन 3 में संक्रमण का विस्तार नहीं होगा। सारे विशेषज्ञों की चेतावनी गलत है और अभी भी कम्युनिटी ट्रांसमिशन नहीं हो रहा है, क्योंकि जब प्रधानमंत्री जी JJयह कह रहे थे देश संक्रमण में 14 लाख 60 हजार की संख्या पार कर चुका था, लेकिन हमें आलोचना की जगह अपना कर्तव्य निर्धारित करना चाहिए और वह कर्तव्य है कि सामाजिक दूरी नहीं शारीरिक दूरी के धर्म का पालन करना चाहिए, मुंह और नाक को सीधी तरह से मास्क या कपड़ा हो या रुमाल हो उससे ढकना चाहिए, जैसे हीं बुखार खांसी और गले में इंफेक्शन दिखाई दे तभी पास के केमिस्ट के पास जाकर उन लक्षणों की दवाई लेनी चाहिए। कोरोना वायरस के इलाज के लिए जो लोग भी अस्पतालों में जा रहे हैं उनके अनुभव अच्छे नहीं हैं, हमारे नेता और प्रेरित करने वाले अभिनेता एम्स जैसे अस्पताल का भी इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं बल्कि वह शहर के सबसे बड़े अस्पताल को अपने इलाज के लायक मान रहे हैं, किसी को इस बात की चिंता नहीं है कि पता करें कौन जिंदा लौट रहा है कौन नहीं लौट रहा, कोशिश करनी चाहिए कि सिनेमा में, या किसी भी भीड़ वाली जगह में ना जाएं। सामाजिक समारोहों, धार्मिक समारोह में अगर जाते हैं तो कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा बहुत बढ़ जाता है। इस खतरे के बावजूद डॉक्टर, नर्स अस्पतालों में काम करने वाले कर्मचारी, एंबुलेंस ड्राइवर, लॉ एनफोर्समेंट एजेंसीज के सिपाही और पत्रकार हमेशा खतरा उठा कर के भी सेवा कर रहे हैं। अगर यह संक्रमण गांव में पहुंच गया तो देश में हाहाकार मच जाएगा, सत्ता और प्रशासन यही समझाने में असफल दिखाई दे रहा है। स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक संगठनों को सरकारें उनके कर्तव्यों का पालन नहीं करने दे रहे हैं। गंभीरता समझाना उनकी सामाजिक जिम्मेदारी है। न्यूज़ चैनल भी सरकार के इशारे पर कोरोना वायरस के संक्रमण के सवाल को गंभीरता से नहीं उठा रहे हैं.. अब अपनी जान बचाने की जिम्मेदारी खुद जनता की है, कहीं से कोई मदद शायद उसके लिए उपलब्ध ना हो पाए, सरकार के पास सरकारी कंपनियां, रेलवे, पेट्रोलियम कंपनियां, एयरलाइंस और वह सारी संपत्ति जो सरकार के नाम है उसे बेचने या डिसइनवेस्टमेंट जैसे महत्वपूर्ण काम है, कहीं ऐसा ना हो कि लाश उठाने वाले भी न मिले। विदेशों में कई जगह यह स्थिति आ चुकी है कि मोर्चरी लाशों से बुरी तरह भरी पड़ी है। क्या होगा बिहार के चुनाव में और क्या होगा बंगाल के चुनाव में यह तो हमें नहीं पता लेकिन अगर डॉक्टर गुलेरिया की चेतावनी सच हुई तो चुनाव में सरकार तो बन जाएगी लेकिन बहुत सारे लोग अपने परिवार के लोगों की जान नहीं बचा पाएंगे, क्योंकि उन्हें बचाने के साधन आम जनता के पास नहीं है, सरकारों के पास है। देश के उद्योगपतियों नें कोरोना वायरस के इलाज के लिए क्या अस्पताल बनाए, क्या आइसोलेशन सेंटर्स बनाए। इसलिए मेरे सहित जीना या मरना ईश्वर के अलावा, खुदा के अलावा, वाहेगुरु के अलावा और यीशु के अलावा अगर किसी के हाथ में है तो वह खुद अपने हाथ में है, राम जन्म भूमि का शिलान्यास भी हो जाएगा और अयोध्या में भव्य मस्जिद भी बन जाएगा। शायद इससे भारत के नागरिकों के कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव हो जाए, जो लोग ऐसा मानते हैं उनकी आरती उतारने चाहिए.. मैं नहीं जानता आप क्या सोचते हैं, लेकिन अगर कुछ नहीं सोचते हैं तो शायद सही नहीं कर रहे हैं, आप नहीं सोच रहे हैं इसलिए सत्ता भी नहीं सोच रही है। राजनीतिक दल भी नहीं सोच रहे हैं और प्रशासन भी नहीं सोच रहा है। सब कुछ ठीक करने की और सोचने की शुरुआत अपने आप से हीं करनी होगी। सुरेन्द्र कुमार सचिव जवाहर ज्योति बाल विकास केन्द्र
