मखाने की सफेदी से चमकेगी किसानों की तकदीर पीपराकोठी। देश में प्राख्यात बिहार का मखाना अब चम्पारण में दस्तक देने को बेकरार है। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र इच्छुक किसानों को मखाने की खेतीं के लिए बीज व तकनीक उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। महात्मा गांधी समेकित अनुसंधान केंद्र में मखाने का बीज नर्सरी तैयार किया गया है। इसके लिए केविके किसानों को प्रशिक्षित कर जागरूक करने की प्रक्रिया आरंभ किया है। बिहार के अन्य क्षेत्रों में मखाने की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। सरकार ने छह जिलों में इसके खेती के लिए 75 फीसद सब्सिडी दे रही हैं।  बंजर, बेकार व जलभराव की वजह से बेकार पड़ी भूमि किसानों के लिए सोना उगलेगा। वहीं छोटे-छोटे तालाब अब सालोभर मखाने की फसलों से गुलजार रहेगी। मखाने की खेती की है खासियत:इसके खेती की खासियत यह है कि इसमें लागत ज्यादा नहीं आती। खेती के लिए तालाब और पानी की जरूरत होती है। ज्यादा गहरे तालाब की जरूरत भी नहीं होती। बस दो से तीन फीट गहरा तालाब ही इसके लिए काफी रहता है। जिन इलाकों में अच्छी बारिश होती है और पानी के संसाधन मौजूद हैं, वहां इसकी खेती खूब फलती-फूलती है। यूं तो मखाने की खेती दिसंबर से जुलाई तक ही होती है। लेकिन अब कृषि की नित-नई तकनीकों और उन्नत किस्म के बीजों की बदौलत किसान साल में मखाने की दो फसलें भी ले सकते हैं। एक हेक्टेयर तालाब में 80 किलो बीज बोये जाते हैं।  सेहत का खजाना मखाना: जैविक विधि से होने वाले मखाना को स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद माना गया है। मखाना में मौजूद प्रोटीन मसल्स बनाने और फिट रखने में मदद करता है। मखाना में सोडियम, पोटेशियम और मैग्नीशियम अच्छी मात्रा में पाया जाता है। ब्लड प्रेशर की शिकायत में मखाना का सेवन किया जा सकता हैं। हड्डी और दांत के लिए भी यह फायदेमंद होता है। डायबिटीज में इसका सेवन लाभदायक होता है। मखाना में एस्ट्रिंजेंट से किडनी की बीमारी से बचता है। इसमें  वसा नहीं होने से वजन भी कम करता है। इसमें भरपूर पोषक तत्व इम्युनिटी बढ़ाने में उपयुक्त माना गया है।  क्या कहते हैं केविके प्रमुख: केविके प्रमुख डॉ.अरबिंद कुमार सिंह ने बताया कि इच्छुक किसानों को बीज उपलब्ध कराया जाएगा। किसानों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ खेती की तकनीक भी उपलब्ध कराई जाएगी।