उत्तर प्रदेश राज्य के बलरामपुर जिला से प्रियंका सिंह ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि भारत के गांव को बचाने के लिए खेती को बचाना आवश्यक है और खेती बचाने के लिए महिला को साधन संपन्न बनाना भी उतना ही आवश्यक है। सरकारी नियमों के अनुसार अभी किसान केवल वही माना जाते हैं जिनके नाम पर जमीन है। ऐसे में कितने महिलाएं किसानों के रूप में पहचाने जाने से वंचित रह जाती हैं। जब महिलाओं के भूमि अधिकारों की बात आती है, तो भूमि विभाजन का डर सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है। इस डर के पीछे उनकी यह चिंता होती है कि महिला परिवार के सदस्यों के बीच भूमि के बंटवारे के विखंडन की स्थिति पैदा होगी और ऐसा संभव है कि भूमि जोत की उत्पादकता और आर्थिक व्यवहार भी प्रभावित हो। परंपरागत रूप से भूमि से जुड़े सभी फैसले लेने का अधिकार रखने वाले परिवार के पुरुष सदस्य, कम कृषि उत्पादन और आर्थिक अस्थिरता से जुड़ी शंकाओं के कारण विभाजन का विरोध कर सकते हैं। अगर परिवार के पास पांच से छे एकड़ भूमि होती है तो प्रयास करना चाहिए एक या आधी एकड़ जमीन महिलाओं को भी दी जानी चाहिए। विस्तार पूर्वक जानकारी के लिए क्लिक करें ऑडियो पर और सुनें पूरी खबर।