बताया गया कि बलरामपुर जिले में जो मोबाइल वाणी पर रफी सर जी की डायरी प्रसारित होती हैं लोगों को बहुत ही ज्यादा अच्छी लग रही है।

मनरेगा योजना तहत जिले में वर्ष 2019-20 लिए 91 करोड़ 90 लाख 26 हजार रुपये का लेबर बजट पेश किया गया। यह जानकारी डीसी प्रदीप सभ्रवाल ने संबंधित विभागों के अधिकारियों की बैठक में दी।उन्होंने बताया कि मनरेगा योजना तहत 25,01,623 दिहाड़ियां पैदा करके 58,384 परिवारों को रोजगार मुहैया करवाया जाएगा। इस योजना तहत 2,956 तरह के विभिन्न प्रकार के काम करवाने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रामीण छप्पड़ों का विकास, गलियों, नालियों, रास्तों को पक्का करने, पंचायती जमीनों में सुधार लाने, नहरी ड्रेनो की खलाई करने, ग्रमीण क्षेत्रों में पार्किग का निर्माण, आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण, श्मशानघाटों की चारदीवारी, खेल ग्राउंड बनाने, इंटरलॉकिंग गलियों व रास्ते बनाने के कार्य करवाए जाएंगे। इसी योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में तीन लाख से अधिक पौधे लगाए जाएंगे।

भारत में बेरोजगारों की तादाद इस रफ्तार से बढ़ रही है कि इंजीनियरिंग, बी. टेक और मास्टर्स करके भी युवा सालों तक नौकरी के लिए भटक रहे हैं। बीते एक साल के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो बेरोजगारी दर में भारी इजाफा हुआ है। ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी’ (CMIE) के मुताबिक पिछले वर्ष फरवरी 2018 में जहां बेरोजगारी दर 5.9 फीसदी थी, वहीं 2019 में यह 7.2 फीसदी हो चुकी है। नौकरी के लिए पढ़े-लिखे युवा किस कदर भटक रहे हैं इसका अंदाजा महाराष्ट्र स्थित चिंचावाड़ में आयोजित एक रोजगार मेले से मिला। न्यूज़ ऐजेंसी रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में यहां पहुंचे बेरोजगारों का दर्द बयां किया गया है।

बीए, बीएससी व बीकॉम कोर्सेज के विद्यार्थियों को कॉलेज से पास होते ही नौकरी मिल सके। इसके लिए उच्च विभाग की ओर से प्लान तैयार किया गया है। और सभी कॉलेजों को नोटिफिकेशन भेज कर श्रेयस योजना के अंतर्गत कॉलेजों को नाम दर्ज करवाने के लिए आदेश जारी किए थे। इसके बाद काॅलेज के विद्यार्थियों को विभिन्न उद्योंगो में ट्रेंनिग करने का मौका मिलेगा। योजना सरकार ने लांच की थी ताकि युवाओं में प्रशिक्षण और कौशल निखार किया जा सके। विद्यार्थियों को बैकिंग, फाइनेंशियल सर्विस, हेल्थ केयर, टूरिज्म, हॉस्पिटेलिटी, इलेक्ट्रॉनिक्स, मीडिया एंड इंटरटेनमेंट, टेलीकोम व अन्य क्षेत्रों में ट्रेनिंग मिलेगी। छह माह ट्रेनिंग, हर महीने मिलेंगे 7500 रुपए| विद्यार्थियों को छह माह की ट्रेनिंग दी जा जाएगी। इस दौरान छात्रों को हर माह वेतन के रूप में 7500 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे। इसमें से 6 हजार रुपए इंडस्ट्री की ओर से देने का प्रावधान है साथ ही 1500 रुपए एनएपीएस की ओर से दिए जाएंगे। ताकि छात्रों को आर्थिक तंगी न आए।

केंद्र सरकार ने नौकरी करते हुए ऊंची डिग्री हासिल करनेवाले कर्मचारियों को दिये जानेवाले एकमुश्त प्रोत्साहन में पांच गुना वृद्धि करने का फैसला किया है. अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी. पीएचडी जैसी डिग्री के लिए प्रोत्साहन रकम न्यूनतम 10,000 से अधिकतम 30,000 रुपये किया जायेगा. कार्मिक मंत्रालय ने कर्मचारियों के लिए इस तरह की प्रोत्साहन राशि बढ़ाने के लिए 20 साल पुराने नियम बदल दिये हैं. अब तक, नौकरी में आने के बाद उच्च डिग्री हासिल करनेवाले सरकारी कर्मचारियों को एकमुश्त 2,000 रुपये से 10,000 रुपये के बीच प्रोत्साहन राशि दी जाती थी. अब न्यूनतम प्रोत्साहन राशि को दो हजार से पांच गुना बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दिया गया है. कार्मिक मंत्रालय द्वारा हाल में जारी आदेश के मुताबिक, अब इस राशि को बढ़ाकर न्यूनतम 10,000 रुपये और अधिकतम 30,000 रुपये करने का फैसला किया गया है. आदेश में स्पष्ट है कि शुद्ध अकादमिक शिक्षा या साहित्यिक विषयों पर उच्च योग्यता प्राप्त पर कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा. हासिल की गयी योग्यता (डिग्री / डिप्लोमा) कर्मचारी के पद से जुड़ी होनी चाहिए या फिर अगले पद पर काम आनेवाले कार्यों से जुड़ी होनी चाहिए. हासिल योग्यता और पद के कार्य के बीच सीधा संबंध होना चाहिए.

आजादी के इतने दिनों बाद भी कार्यस्थल पर लैंगिक समानता महज जुमला साबित हो रहा है। बीमा कंपनी आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के एक सर्वे से पता चला है कि 62 फीसदी महिलाओं को कार्यस्थल वेतन समानता के मुद्दे को मान्यता नहीं दी जाती है। वेतन में भेदभाव का ज्यादा मामला वित्तीय और विनिर्माण क्षेत्र में देखने को मिला है।इस सर्वेक्षण के मुताबिक करीब 62 फीसदी युवतियों का मानना है कि उनके पास जो नौकरी है और उन्होंने जिस नौकरी की कल्पना की थी उसमें कोई समानता नहीं है। जब कार्य स्थल पर पुरुषों के समान वेतन की बात होती है तो इसमें भी लैंगिक भेदभाव की बात सामने आती है।इससे महिलाओं में हताशा का भाव आता है और उनका प्रदर्शन प्रभावित होता है। यही नहीं, इस वजह से उपजी हताशा की वजह से वह अपनी क्षमता से परे काम करने लगती है और उनका स्वास्थ्य खराब होता है।53 फीसदी महिलाएं मानती हैं कि उनका कार्यस्थल अभी भी पुरुष प्रधान है। यही नहीं, जैसे-जैसे महिलाएं उम्र दराज होती जाती हैं, उन्हें पुरुषों के लिए अनुपयुक्त काम या असाइनमेंट सौंप दिए जाते हैं। 22 से 33 साल की युवतियां और 33 से 44 वर्ष की महिलाएं मानती हैं कि पुरुष प्रधान कार्यस्थल में उनकी पदोन्नति का अवसर भी प्रभावित होता है। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के इस सर्वेक्षण में 22 से 55 साल की महिलाओं को शामिल किया गया था।

दुनिया की दिग्गज प्रौद्योगिकी कंपनी आईबीएम की प्रमुख गिन्नी रोमेट्टी ने कहा कि भारतीयों में नए जमाने की नौकरियों के लिए जरूरी कौशल की कमी है। इस कारण उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं, जबकि नए जमाने के रोजगार अधिक मात्रा में पैदा हो रहे हैं।उन्होंने बताया कि कुल 180 अरब डॉलर के घरेलू सॉफ्टवेयर उद्योग में प्रत्यक्ष रूप से 40 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। आईबीएम की चेयरमैन, अध्यक्ष और मुख्य कार्यपालक अधिकारी रोमेट्टी ने कहा कि यह सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक समस्या है।कंपनी के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने बुधवार को कहा कि भारत में वही परेशानियां हैं। यहां नई नौकरियों का सृजन हो रहा है, लेकिन उनके अनुरूप काबिलियत या कौशल नहीं है।रोमेट्टी ने कहा कि मुझे लगता है कि आप अतीत में विश्वास करने की तुलना में कुछ अलग चीजों में विश्वास करते हैं। आपको यह भरोसा करना होगा कि डिग्री के मुकाबले कौशल ज्यादा जरूरी है। उन्होंने यह बात ऐसे समय कही है, जबकि यह कहा जाता है कि इंजीनियरिंग की डिग्री वाले लाखों युवाओं के पास नौकरी नहीं है।उन्हें अगर शुरुआती स्तर पर नौकरी मिलती भी है तो अनुभव रखने वाले अर्ध-कुशल कामगारों से बहुत कम वेतन मिलता है।

पिछले 17 महीनों में देश के करीब 76 लाख लोगों को रोजगार मिला है। वहीं जनवरी में पिछले साल के मुकाबले 131 फीसदी इजाफा देखने को मिला है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक इन 17 महीनों में सबसे ज्यादा नौकरियां लोगों को इस साल जनवरी महीने में मिली हैं।ईपीएफओ ने यह आंकड़ा नए यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) जारी होने के आधार पर जारी किया है। ईपीएफओ ने कहा कि सबसे ज्यादा नई नौकरियां 22-25 वर्ष की उम्र के लोगों ने पाई हैं। इसकी संख्या करीब 2.44 लाख है। इसके बाद दूसरे नंबर पर 18-21 साल के फ्रेशर हैं, जिनकी संख्या 2.24 लाख है। फिलहाल ईपीएफओ अंशधारकों की संख्या छह करोड़ से ज्यादा है।

दूसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी सरकार को एक सर्वे से झटका झटका लग सकता है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2011-12 और 2017-18 के बीच ग्रामीण भारत में करीब 3.2 करोड़ कैजुअल मजदूरों ने अपनी नौकरी खो दी, जो पिछले सर्वेक्षण में 29.2 प्रतिशत थी। नौकरी गंवाने में लोगों में लगभग तीन करोड़ खेती करने वाले थे। NSSO द्वारा जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2017-18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 के बाद से खेत में काम करने वाले लोगों की संख्या में 40 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, जिसे सरकार ने जारी करने से मना कर दिया। कैजुअल लेबर से मतलब ऐसे लोगों से है जिन्हें अस्थाई रूप से काम रखा जाता है।

वित्तीय तंगी से जूझ रही जेट एयरवेजके घरेलू पायलटों के संगठन ने मंगलवार को चेतावनी दी कि अगर समाधान योजना में देरी होती है और उनके बकाया वेतन का भुगतान इस महीने के अंत तक नहीं किया जाता है तो 1 अप्रैल से उड़ान रोक दी जाएगी। जेट एयरवेज घरेलू पायलटों के निकाय नैशनल एविएटर्स गिल्ड की 90 मिनट से अधिक चली सालाना बैठक में इस आशय का निर्णय किया गया। गिल्ड में एयरलाइन के करीब 1,000 घरेलू पायलट हैं। यह संगठन करीब एक दशक पहले अस्तित्व में आया था। संगठन ने कहा, 'अगर समाधान प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हुई और वेतन भुगतान 31 मार्च तक नहीं हुआ, हम 1 अप्रैल से उड़ानें बंद कर देंगे।' वेतन के मामले में प्रबंधन से कोई आश्वासन नहीं मिलने के बाद गिल्ड ने पिछले सप्ताह ने श्रम मंत्री संतोष गंगवार को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप का आग्रह किया। इस बीच, विमानन मंत्री सुरेश प्रभु ने मंगलवार को अपने सचिव को कर्ज में डूबी एयरलाइन के साथ आपात बैठक करने का निर्देश दिया। कई विमानों के उड़ान नहीं भरने के कारण एयरलाइन बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द कर रही है।