भारत में खेती से जुड़ें कामों में महिलाओं की भागीदारी 70% के लगभग है जबकि वास्तिविकता में यह 15 प्रतिशत के करीब आती है सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 30% महिलाओं को ही “किसान” के तौर पर जाना जाता है. यह भारत में कामकाजी महिलाओं का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा खेती और उससे जुड़े कार्यों में लगा हुआ है.
झारखण्ड राज्य के हजारीबाग जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि महिलाएं खेत में हर तरह की काम करती हैं लेकिन उनको सिर्फ मजदूर ही समझा जाता है। महिलाओं के आवाज़ को दबा दिया जाता है। महिला खुद के खेत में काम करती है और पैसा कमाती है फिर भी उनको मजदूर के रूप में ही देखा जाता है
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झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि भूमि स्वामित्व का अभाव में अधिकांश महिलाओं के पास उनके नाम पर जमीन नहीं होती है। जिसे वे लोन या सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं। ऋण और संसाधनों तक सीमित पहुंच -इसमें बैंक लोन ,खाद उन्नत्ति बीज और यंत्रीकरण तक उनकी पहुंच पुरुषों की तुलना में बहुत कम है। अवैध तकनीक श्रम और असमान वेतन -वे खेतों में सबसे कठिन काम जैसे की रोपाई,निराई ,कटाई ,जुताई करती हैं। लेकिन उन्हें अक्सर किसान के रूप में मान्यता नहीं मिलती है और समान काम के लिए पुरुषों से कम वेतन भी मिलता है
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि भारत में महिला किसान को भूमि स्वामित्व के अभाव में लोन और उन्नत कृषि तकनीकों तक सिमित पहुँच समान मजदूरी न मिलने और पारिवारिक घरेलू जिमेदारियों की बोझ जैसी प्रमुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वे अक्सर अकुशल श्रम और मौसमी बेरोजगारी से भी जूझती हैं
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि महिला किसान के रूप में काम करती हैं लेकिन उनको अधिकार नहीं दिया जाता है। लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं खेती करती हैं। महिलाओं को न तो किसान के रूप में देखा जाता है और न ही किसान के रूप में अधिकार दिया जाता है
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झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि भारत भर में पीएम किसान योजना ,किसान क्रेडिट कार्ड फसल बीमा योजना और सुखा राहत कार्यक्रम जैसी कल्याणकारी योजनाएँ आज भी एक पुराने मापदंड पर निर्भर है। भूमि स्वामित्य लेकिन अधिकांश ग्रामीण परिवारों में भूमि का स्वामित्य पुरुषों के हाथों में है। लाखों महिला किसान विशेष रूप से विधवाएं ,एकल महिलाएं ,दलित ,आदिवासी और मुस्लिम किसान उन योजनाओं से वंचित रह जाती हैं जो कृषि समुदाय के समर्थन के लिए बनाई गयी है
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि भारत को कृषि प्रधान देश होने पर गर्व है। चुनावी नारों ,वादों और सांस्कृतिक प्रतीकों में किसानों का महिमामंडन किया जाता है। महिलाओं का श्रम अनदेखा किया जाता है। उनके स्वामित्व को अनदेखा किया जाता है। महिलाओं के आवाज़ को व्यवस्थित रूप से दबा दिया जाता है
झारखण्ड राज्य के हज़ारीबाग़ जिला से राज कुमार मेहता मोबाइल वाणी के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि भारत प्रदेश की पहचान एक कृषि प्रधान देश के तौर पर जानी जाती है।किसानो के हाल बेहाल हैं। आज किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। नेतागण किसानों की समस्याओं को नहीं समझते हैं। किसानो को सिर्फ दौड़ाया जाता है और समाधान नहीं होता है।
