उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से रमजान अली मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि महिलाओं से बात करने पर उनका विचार है कि जैसे बेटा को जमीन में हक़ मिलता है वैसे ही बेटी को भी बराबर का हक़ मिलना चाहिए।
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से विजय पाल चौधरी मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती है कि महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी है। लेकिन महिलाओं को इसकी पूर्ण जानकारी नहीं है कि कैसे और कहाँ जा कर अधिकार लिया जाए। और वही जानकारी के अभाव में महिलाएँ अधिकार लेने से वंचित रह जाती है। इसलिए महिलाओं को मोबाइल वाणी के ज़रिये जानकारी मिलनी चाहिए
अधिकांश व्यक्तिगत पट्टे पुरुषों के नाम पर होते हैं. सामुदायिक अधिकारों में भी महिलाओं को भी कम प्रतिनिधित्व दिया जाता है. इसके चलते महिलाएं केवल खेत मजदूर बनकर रह जाती हैं. महिलाओं को इसका नुकसान यह होता है कि बैंक, बीमा तथा दूसरी सरकारी सहायता का लाभ नहीं उठा पाती है, जो उनके लिए चलाई जा रही हैं.
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से प्रीति सिंह मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि महिलाओं को जमीन का पैतृिक संपत्ति और स्वयं खरीदी या उपहार में मिली संपत्ति दोनों पर अधिकार लड़कों के बराबर होना चाहिए। जो हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 से मिला है। जिसके तहत बेटियों को भी बेटों जितना हक होना चाहिए। पति की मृत्यु पर पत्नी को गुजारा भत्ता और संपत्ति का हिस्सा मिलना चाहिए। आजकल लोग विधवा महिला को संपत्ति में हिस्सा नहीं देना चाहते हैं। तलाक के बाद भी गुजारा भत्ता और संपत्ति का हिस्सा मिल सकता है। लेकिन ये कोर्ट के अनुसार होता है। लेकिन विधवा महिलाओं को तो मिलना ही चाहिए।
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उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलायें सुबह से शाम तक खेती संभालती है, बीज लगाना पानी देना फसल का ध्यान रखना सब कुछ करती हैं। लेकिन जब कागज देखे जाते है, तो जमीन का मालिक कोई और होता है। ये सिर्फ नाइंसाफी नहीं बल्कि महिला की मेहनत को नजरअंदाज करना है। अगर जमीन उसके नाम हो तो वो नए तरीके अपना सकती है। खेती में सुधार ला सकती है और अपने परिवार को और आगे बढ़ा सकती है। जो खेत संभालती है उसका नाम भी जमीन पर होना ही चाहिए
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि आज के समय में बेटियां भी काम कर आत्मनिर्भर हैं और अपने अभिभावक की जिम्मेदारी उठाती है। लेकिन फिर भी विरासत देने के समय बेटियों को याद नहीं किया जाता है। बेटी का हक भाई के बराबर होता है। फिर भी बेटी से सिर्फ साइन करवा लिया जाता है। जिसके बाद जमीन भाई की हो जाती है। बेटी को कहा जाता है की तुम्हें तो शादी में दे दिया गया है। लेकिन इससे बेटी का हक कम या खत्म नहीं हो जाता है। बेटियों को ना मायके में ना ससुराल में विरासत में कोई हक दिया जाता है।अगर हम सच में बराबरी चाहते हैं, तो हमें अपने मन में बदलाव लाना होगा
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि जब जमीन महिला के नाम होती है तो उसे सिर्फ प्रॉपर्टी नहीं मिलती सुरक्षा भी मिलती है। सिक्योरिटी मिलती है। वो बैंक से लोन ले सकती है। अपना काम शुरू कर सकती है और मुश्किल वक्त में किसी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहती। वो मुश्किल समय में अपना काम खुद कर सकती है। अपने आप को संभाल सकती है। अक्सर देखा गया है की जिनके पास अपनी जमीन होती है उन महिलाओं के साथ अत्याचार कम होता है। क्योंकि उनकी आवाज मजबूत हो पाती है वो गलत के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत कर पाती है। उन्हें पता होता है की अगर कोई मेरा साथ ना भी दे तो मेरे पास एक प्रोपर्टी है। जिसके जरिए वो अपनी जिंदगी काट सकती है। उसे एक तरह की सुरक्षा रहती है, इसलिए उसकी आवाज भी मजबूत हो जाती है। भूमि का अधिकार का मतलब है डर से आजादी और भविष्य का भरोसा
उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से संस्कृति श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहती हैं कि महिलाओं का भूमि अधिकार एक ऐसा हक है, जो कानून ने दिया है, पर समाज ने अभी तक पूरी तरह से माना नहीं हैं। अक्सर जमीन बेटे के नाम होता है,बेटी से कहा जाता है की तुम तो पराई हो।पर सवाल ये है क्या मेहनत पराई होती है, जो महिला खेत में काम करती है, फसल उगाती है, घर संभालती है। क्या उसका हक कम हो जाता है ? जब कानून बराबर का हक दे रही है तो कागजों पर बेटियों को जमीन क्यों नहीं दिया जाता है। जमीन पर हक देने का मतलब सिर्फ अधिकार देना नहीं है। बल्कि ये बताना भी है कि बेटियां घर का हिस्सा है बोझ नहीं
गांव आजीविका और हम कार्यक्रम के तहत हमारे कृषि विशेषज्ञ श्री जीब दास साहू आम के छोटे पौधों में लगने वाले तना छेदक कीड़े और उसके उपचार की जानकारी दे रहे हैं ।
