मोटाभाई ने महज एक शादी में जितना खर्च किया है, वह उनकी दौलत 118 बिलियन डॉलर का 0.27 है। जबकि उनकी दौलत कृषि संकट से जूझ रहे देश का केंद्रीय बजट का 7.5 प्रतिशत से भी कम है। जिस मीडिया की जिम्मेदारी थी कि वह लोगों को सच बताएगा बिना किसी का पक्ष लिए, क्या यह वही सच है? अगर हां तो फिर इसके आगे कोई सवाल ही नहीं बनता और अगर यह सच नहीं तो फिर मीडिया द्वारा महज एक शादी को देश का अचीवमेंट बताना शुद्ध रूप से मुनाफे से जुड़ा मसला है जो विज्ञापन के रुप में आम लोगों के सामने आता है। क्योंकि मीडिया का लगभग पचास प्रतिशत हिस्सा तो मोटाभाई का खुद का है और जो नहीं है वह विज्ञापन के लिए हो जाता है "कर लो दुनिया मुट्ठी में” की तर्ज पर। दोस्तों, इस मुद्दे पर आप क्या सोचते है ?अपनी राय रिकॉर्ड करें मोबाईलवाणी पर, अपने फोन से तीन नंबर का बटन दबाकर या फिर मोबाईल का एप डाउनलोड करके।
उत्तर प्रदेश राज्य से अमित शर्मा मॉविले वाणी के माध्यम से हमारे श्रोता की बात कि , उन्होंने बताया की पर्यावरण मानव शरीर की आत्मा है, ऐसे में पर्यावरण की स्थिति विकराल रूप ले सकती है। विकास के कार्यों के साथ पेड़ों को अंधाधुन काटा जा रहा है ऐसे में प्राकृतिक संतुलन काफी हद तक बिगड़ रहा है। यही कारण है कि गर्मी तेज और बारिश का पता नहीं चल रहा है कहीं न कहीं पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है। तो ऐसी स्थिति में हमें गंभीरता से लेना चाहिए और इसके साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हमें एक-एक पेड़ लगाना चाहिए जिससे पर्यावरण का संतुलन बना रहे और मानव जीवन सुरक्षित रहे।
उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिला से से आकांक्षा श्रीवास्तव ने मोबाइल वाणी के माध्यम से बताया कि महिलाओं को भूमि अधिकार मिलने चाहिए यह एक बहुत ही प्रासंगिक प्रश्न है क्योंकि जहां महिलाओं के अधिकारों का संबंध है, समाज का भी है। वे चुप रहते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि अगर महिलाओं को उनके अधिकार मिलते हैं, तो वे आगे बढ़ेंगी और यह हमारे नियंत्रण में नहीं है। महिलाओं को शादी से पहले या शादी के बाद अपनी पैतृक भूमि पर पूरा अधिकार है, जैसे बेटों को अधिकार है, वैसे ही बेटियों को भी समान अधिकार हैं। यह लागू किया गया है कि अब उनकी बेटियों को पिता की जमीन पर बेटे और बेटियों के समान अधिकार होगा क्योंकि अगर लड़कियों को जमीन पर अधिकार मिलता है, तो इससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। वह अपनी वसीयत की मालिक होगी, वह जो चाहेगी वह करेगी, यह विचार का विषय है कि अगर पिता जीवित नहीं है, तो क्या उसके भाई उसे जमीन का अधिकार देंगे, भले ही वे देना न चाहें। इसलिए यह कानून है कि लड़के उस अधिकार को ले सकते हैं क्योंकि ऐसा हमेशा से रहा है कि पुरुषों ने हमेशा महिलाओं को खुद के बजाय कमजोर के रूप में देखा है। क्योंकि वह यह नहीं सोचते कि अगर एक महिला शिक्षित होगी तो वह अपने अधिकार के लिए लड़ेगी, तो हमारा समाज आगे बढ़ेगा, हमारा देश आगे बढ़ेगा और उन्हें भी समाज में पूरी समानता मिलेगी। पुरुष सोचते हैं कि अगर हम महिलाओं को यह अधिकार देंगे तो उन्हें नुकसान होगा। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। ससुराल वालों को भी अपनी बहू को अपनी संपत्ति और पैतृक भूमि पर अधिकार देना चाहिए। माता-पिता को अपनी बेटियों को शिक्षा के अधिकार जैसे अधिकार देने से वंचित नहीं करना चाहिए। आज हमारी महिलाएं शिक्षा के क्षेत्र में कितनी आगे आई हैं। वे बड़े पदों पर काम कर रहे हैं। यह बंद हो जाता था, लेकिन बाद में हमारी सरकार ने ऐसे कई स्कूल, ऐसी नौकरियां रखी हैं, ताकि महिलाएं आगे बढ़ सकें और वे समाज में पुरुषों के बराबर हो सकें।
उत्तर प्रदेश राज्य के मिर्जापुर जिला से हमारे श्रोता ने मोबाइल वाणी के माध्यम से रमा से बातचीत की। रमा का कहना है कि महिलाओं को जमीनी अधिकार मिलना चाहिए। महिलाओं को शिक्षित होना चाहिए ताकि उन्हें अधिकार मिल सके। उनका कहना है उनके पति के नाम से उन्हें जाना जाता है। उनके पति ने जमीन उनके नाम पर कर दिया है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सके
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जयपुर जिले के ग्राम पंचायत देव परमा पोस्ट बल्लीपर्मा ब्लॉक की शीला देवी हूँ, आज मैं ग्रामवाड़ी के माध्यम से उस स्तर की कुछ बहनों से बात कर रही हूँ। मीडिया चैनल के माध्यम से मैं महिला सशक्तिकरण के बारे में कुछ बातें करने जा रहा हूं। हाँ जी, आपका नाम क्या है? हां, हमें अपना नाम मिल गया है। हां, हमें अपना पर्केट मिल गया है। सबसे पहले, हमें अपना नाम मिल गया है। हम समूह से बात कर रहे हैं। ठीक है, आपके गाँव का नाम क्या है? देव परम तो दीदी ये बातिये, आज हम अपनी ग्रामवाली के माध्यम से इस मंच पर महिला सशक्तिकरण के बारे में कुछ चर्चा करने जा रहे हैं। अगर महिलाओं को भूमि का अधिकार नहीं दिया जाता है, तो मुझे बताएं कि आपको क्या मिलना चाहिए, नए समाज में कई कैदियों को उठना चाहिए या नहीं, या ये लोग कैसे आगे आए हैं। हां, अगर हम उन्हें भूमि का अधिकार देते हैं, तो उन्हें बताएं कि वे अपने परिवार को अपने जीवन में किस समस्या से आगे ले जा सकते हैं, यानी हमें अपने बच्चों को लिखना और आगे बढ़ना सिखाना चाहिए क्योंकि हम पढ़ाना, लिखना और शिक्षित करना चाहते हैं। अगर आप सब कुछ करना चाहते हैं क्योंकि आपको जमीन का अधिकार मिलेगा, तो आप अपने बच्चों को सही शिक्षा और परवरिश दे सकते हैं क्योंकि ऐसा भी होता है कि कभी-कभी गांव की महिलाओं को उनके नाम पर जमीन मिल रही है, इसलिए लोग घर में विरोध करते हैं। दूसरी ओर, सभी को करना चाहिए या न करना चाहिए या न करना चाहिए क्योंकि हम मानते हैं कि कोई आपत्ति नहीं है, कोई आपत्ति नहीं है, कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, हमें लोगों से बात नहीं करनी चाहिए थी, इसलिए हमें मिलकर यह आवाज उठानी होगी।
पकौड़ी बानाने का काम करना चाहती हु
उत्तरप्रदेश राज्य के गोरखपुर जिला से आकांक्षा श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से बता रही हैं कि लैंगिक असमानता का अर्थ लिंग के आधार पर महिलाओं के साथ हो रही भेदभाव को कहते हैं। परम्परागत रूप से समाज में महिलाओं को कमजोर समझा जाता रहा है। वे घर और समाज में दोनों जगहों में सामाजिक अपमान और भेदभाव का सामना करती हैं। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव दुनिया में लगभग हर जगह प्रचलित है।विश्व आर्थिक मंच ने दो हजार इकतीस की पंद्रहवीं वैश्विक लिंग असमानता सूचकांक रिपोर्ट जारी की, जिसमें एक सौ छप्पन देशों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आर्थिक गैर-भागीदारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें और उनकी पहुंच और राजनीतिक सशक्तिकरण शामिल हैं। रिपोर्ट में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के लिए उठाए जा रहे कदमों जैसे प्रमुख संकेतकों का उल्लेख किया गया था।
उत्तर प्रदेश के हाथरस में अचानक से भारी भीड़ पहुंच जाती है। तो जाहिर सी बात है की सिस्टम अस्त व्यस्त हो जाती है। लेकिन अगर जिला प्रशासन इन बातों पर ध्यान दें और उन सब चीजों को व्यवस्थित करें या अगर कोई कार्यक्रम हो रहा है तो उसे कार्यक्रम के पूर्व एक निर्धारित मापदंड बनाया जाए जिससे उसे कार्यक्रम को सफल कराया जाए ।
"गांव आजीविका और हम" कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि विशेषज्ञ जीव दास साहू ,ज्वार के फसल के लिए मिट्टी एवं बीज का चयन और बीज शोधन की जानकरी दे रहे हैं। ज्वार के फसल से जुड़ी कुछ बातें किसानों को ध्यान में रखना ज़रूरी है। इसकी पूरी जानकारी सुनने के लिए ऑडियो पर क्लिक करें.
