दो मिनट खड़े हो जाओ तस्वीर देख लो फाटक पर ।  कोई लौटा दें कवि मुकुर के बीते हुए वो दिन। मामला जमालपुर कारखाना का। गंगा रजक मुंगेर। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के समकक्ष कवि दुर्गा मुकुर की कविता और जमालपुर रेल कारखाना में घटते मजदूर आज सरकार के लिए झंझावात बन पड़ी है। प्रख्यात साहित्यकार भाजपाई जी रचना के लिए प्रसिद्ध थे। उसी तरह दुर्गा मुकुर अंग प्रदेश में अपनी रचना के लिए प्रसिद्ध थे और मिट्टी की सोंधी खुशबू बिखेरते थे। उनकी कविताओं में जीवंत था, लेकिन सरकार की जो स्थिति है वह जीवंत कविता अखबार के पन्नों में साहित्यकार के बीच गुम होने लगा है। आज प्रसिद्ध रचना को संवारने वाला भी कोई नहीं है। कारखाना ने पूरे शहर को धुंंआ दिया, बदले में बिजली और पानी नहीं दी। अंग्रेजों ने जिस शहर को बसाया आज वह शहर टिस टिस कर दम तोड़ने को बेताब है। जो बिहार से भाजपा मुखर हुई और लालू यादव जेल गए । आज वो भाजपा के दो-दो प्रधानमंत्री रेल नगर जमालपुर को भूल गए। विडंबना है कि दुर्गा मुकुर जैसे लोक कवि की रचना तो नहीं संवर पाई। लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार मिली और जब मुंगेर में ओभरव्रिज उद्घांंटन की बारी थी उसमें रेल सह सड़क पुल की योजना थी। जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने शिल्यानास किया और आज तक उसका कार्य अधूरा है। रेल पटरी पर ट्रेनें तो दौड़ रही है लेकिन रोड नहीं बन पाया हैंं। वहीं वर्तमान प्रधानमंत्री मुंगेर आए और उन्होंने मुंगेर के जवानी और पानी को सराहा था। जो सच था।लेकिन उस जवानी का होंठ सूख रहा हैं और उस पानी का तासीर कम हो रहा हैं। जानकारी के मुताबिक दिनकर ने राष्ट्र को संदेश दिया और सभी प्रधानमंत्री मुंगेर के दिनकर को जानते हैं। लेकिन मुंगेर की विकास की बात होगी तो  मुंगेर याद भी नहीं आता है। दुर्गा मुकुर की कविताओं पर ध्यान दें तो उन्होंने छः नंबर गेट पर गंभीर कविता लिखा है । जो व्यंग्य भी हैं और प्रेरणादाई भी। उन्होंने कहा  " दो मिनट खड़े हो जाओ तस्वीर देख लो फाटक पर, जीवन पर हर तकदीर देख लो फाटक पर। इनकी कविता में जमालपुर कारखाना के छः नंबर गेट की भरपूर जिक्र है और जीवंत भी क्योंकि 6 नंबर गेट पर भाजपाई को प्रधानमंत्री बनने के पूर्व भारी भीड़ होती थी और पूरा दिन के दो समय सुबह 7 बजे और शाम 4 बजे जब रेलकर्मी निकलते थे । इस छोटे से मोड़ पर कम से कम एक लाख की बिक्री होती थी। स्थानीय व्यवसायी सहित आसपास के ठेला व हॉकर दुकानदार मालामाल हो कर जाते थे और चेहरे पर मुस्कान की फुलझड़ियां छुटती थी। क्योंकि इसी छः नंबर गेट से तीन श्रमिक ट्रेन तीन दिशा में प्रस्थान करती थी। जिसमें अनेकों भेंडर यहां अपना व्यवसाय करते थे और यह ट्रेन तीन दिशा में जाने के साथ भेंडर भी अपना व्यवसाय तीन दिशा में करते थे। यह ट्रेन जमालपुर से मुंगेर, जमालपुर से सुल्तानगंज तथा जमालपुर से उड़ैन । जो 80 किलोमीटर परिधि के दायरे में फैला था। इस ट्रेन को यूनियन के आंदोलन के बावजूद बंद कर दिया गया और ट्रेन बंद होते ही हजारों हजार युवकों, व्यवसायियों के पेट में लूरा बन कर ताला लग गया। रेल कारखाना के तमाम अधिकारी दुर्गा मुकुर से वाकिफ है और आज भी उनके कायल है। उन्होंने मुंगेरिया,श्रमिक ट्रेन,बिजुरिया जैसे अनेक कविता को लिखा। " कईसन कलेजवा में लग जाए धक से, मार दूर हो बतिया बुता जाय भक से " । इस कविता का सार तत्कालिक सरकार से था। जो बिजली के जगह अंधेरा दिया लेकिन नीतीश सरकार में बिजली की खामियां दूर हुई और कविता का सार भी पूरा हुआ। लेकिन दुर्गा मुकुर का तमाम व्यंग केंद्र सरकार ने आज तक पूरा नहीं कर पाई है। 12 वर्षों की भाजपा सरकार को लोगों ने बहुत ही उम्मीद से देखा था और बिहार में भाजपा के 17 सांसदों को दिया। जबकि जदयू को 16 वहीं लोजपा के 6 सांसद सहित कुल 39 सांसद दी हैं। अब तो प्रश्नचिन्ह उठने लगा है कि बिहार के सांसद को यह भी पता है कि नहीं बिहार में एशिया प्रसिद्ध जमालपुर कारखाना है कि नहीं ? जो गंभीर सवाल हो गए हैं कि संसद में जाकर बिहार के परिदृश्य को रखते हैं या नहीं या सांसद निधि भझाने में व्यस्त रहते हैं। बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। लोग पूछेंगे जुदाई का सबब । अब देखना है कारखाना का राष्ट्रीय मुद्दे और मुंगेर पुल के नाम पर विधानसभा चुनाव में भाजपा जदयू गठबंधन कितना खरा उतर पाती है।