बचपन से सिखाएं संयम और जीवन ‘संयममय जीवन हो’ – यह गीत अनुप्राणित करता है, प्रेरणा देता है, जीवन की दृष्टि देता है । परन्तु जरा निष्पक्ष आत्म समीक्षा करके देखें, क्या वास्तव में हम जीवन में संयम का पालन कर पाते हैं अथवा यह गीत केवल कार्यक्रमों में दोहराये जाने वाला कर्मकाण्ड भर रह जाता है? संयम अर्थात् मर्यादान्तर्गत क्रिया । प्रकृति ने सृष्टि के क्रम को व्यवस्थित चलाये रखने के लिए प्रत्येक तत्व, वस्तु और व्यक्ति की मर्यादा निर्धरित की है । उस मर्यादा का पालन करना ही संयम है । शरीर को चलाने के लिए भोजन आवश्यक है अतः भूखा रहना भी प्रकृति के विरुद्ध है और भूख से अधिक खाना भी । शरीर की आवश्यकता से अधिक खाना मर्यादा के विरुद्ध है तो प्रकृति किसी न किसी रोग-व्याधि के रूप में उस मर्यादा उल्लंघन का दण्ड भी देती है । ‘वाचाल’ और ‘मूक’ के बीच की स्थिति ‘संयमी’ की होती है । संयमहीन व्यक्ति स्वयं भी कष्ट भोगता है, औरों को भी कष्ट में डालता है । असंयम के मूल में कारण है असंवेदनशीलता । जब व्यक्ति आत्मकेन्द्रित होकर केवल अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधा, मान-सम्मान, रुचि-अरुचि, लाभालाभ का ही विचार करने लगता है तो वह मर्यादाओं का, संयमशीलता का ध्यान नहीं रख पाता । ईशावास्योपनिषद का प्रथम श्लोक- ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचा जगत्यांजगत् । तेन त्यक्तेन भुजींथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् । । भारत की जीवनदृष्टि है । प्रकृति से उतना लेना, जितना मेरी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आवश्यक हो । परन्तु इस ‘आवश्यकता’ शब्द की ठी क-ठीक समीक्षा भी आवश्यक है । ‘Need’ can be satisfied, but ‘greed’ cannot be. संवेदनशीलता के अभाव में अपनी आवश्यकता तो महत्वपूर्ण दिखाई देती है परन्तु Need और greed के बीच की बारीक सी विभाजक रेखा की ओर ध्यान नहीं जाता । और इसीलिए असंयम और गैर-जिम्मेदारी, साथ-साथ स्वभाव का अंग बनते हैं । प्रत्येक पिछली पीढ़ी को लगता है नई पीढ़ी विचारहीन है, संवेदनहीन है, संयमहीन है, गैर-जिम्मेदार है । यह ‘कहानी घर-घर की’ है परन्तु फिर एक निष्पक्ष आत्मालोचना की आवश्यकता है – क्या हमने कभी ईमानदार और आग्रहपूर्ण प्रयास किया नई पीढ़ी को संयम, आत्मानुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी सिखाने का? संयमपूर्ण-मर्यादापूर्ण-विवेकपूर्ण आचरण के संस्कार के बीज बचपन से ही डाले जायेंगे तब तो बड़े होकर पुष्पित-पल्लवित होंगे, परिवार और समाज की बगिया को अपनी सुगंध से भरेंगे । हम ‘बड़ों’ के विचारार्थ मैं ऐसे ही कुछ बिन्दु प्रस्तुत कर रहा हूँ, क्योंकि ये संस्कार तो बचपन से ही, परिवार में ही सिखाये जा सकते हैं, कोई स्कूल-कालेज नहीं सिखा सकता । कहा जाता है ‘माता प्रथम गुरुः’ अतः यह दायित्व ‘माताओं’ पर थोड़ा और अधिक आ जाता है क्योंकि प्रायः परिवार में ‘पिताजी’ के पास तो फुरसत और धैर्य, दोनों का ही अभाव रहता है । तो प्रस्तुत है, साधारण सी प्रतीत होने वाली ‘संयम’ की विधायें:
