बिहार राज्य के जिला मुंगेर से रंजन मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि बदलते मौसम में डायरिया से पीड़ित बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. डायरिया के कारण बच्चों में अत्यधिक निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) होने से समस्याएं बढ़ जाती है एवं कुशल प्रबंधन के आभाव में यह जानलेवा भी हो जाता है. शिशु मृत्यु दर के कारणों में डायरिया भी एक प्रमुख कारण है. इसके लिए डायरिया के लक्ष्णों के प्रति सतर्कता एवं सही समय पर उचित प्रबंधन प्रदान कर बच्चों को डायरिया जैसे गंभीर रोग से आसानी से सुरक्षित किया जा सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बच्चों में 24 घंटे के दौरान तीन या उससे अधिक बार पानी जैसा दस्त आना डायरिया है. लेकिन यदि तीन या इससे अधिक बार पतले दस्त की जगह सामान्य दस्त हो तो उसे डायरिया नहीं समझा जाता है . डायरिया मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं. पहला एक्यूट वाटरी डायरिया जिसमें दस्त काफ़ी पतला होता है एवं यह कुछ घंटों या कुछ दिनों तक ही होता है. इससे निर्जलीकरण(डिहाइड्रेशन) एवं अचानक वजन में गिरावट होने का ख़तरा बढ़ जाता है. दूसरा एक्यूट ब्लडी डायरिया जिसे शूल के नाम से भी जाना जाता है. इससे आंत में संक्रमण एवं कुपोषण का खतरा बढ़ जाता है. तीसरा परसिस्टेंट डायरिया जो 14 दिन या इससे अधिक समय तक रहता है. इसके कारण बच्चों में कुपोषण एवं गैर-आंत के संक्रमण फ़ैलने की संभावना बढ़ जाती है. चौथा अति कुपोषित बच्चों में होने वाला डायरिया होता है जो गंभीर डायरिया की श्रेणी में आता है. इससे व्यवस्थित संक्रमण, निर्जलीकरण, ह्रदय संबंधित समस्या, विटामिन एवं जरुरी खनिज लवण की कमी हो जाती है. इन लक्ष्णों का माताएं रखें ध्यान: डायरिया के शुरूआती लक्ष्णों का ध्यान रख माताएं इसकी आसानी से पहचान कर सकती हैं.
