गोवर्धन-पूजा में 'हाँता' की अद्भुत परंपरा ************************ राजेश तिवारी मोबाइल वाणी छिंदवाड़ा दीपावली का दूसरा दिन चिरैयागौर या गोवर्धन-पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में घरों की दीवारों पर अहीर-समाज के द्वारा सेम की पत्ती के हरे रंग और लाल गेरू से कुछ अटपटे-से चित्र बनाए जाते हैं,जिन्हें 'हाँता' कहा जाता है। ये चित्र किसी गूढ़ लिपि में होते हैं। इसी तरह के चित्र हमारे यहाँ हलछठ में भी देखने को मिलते हैं और जन्माष्टमी आदि में भी। यह गूढ़लिपि हमें तांत्रिक-परंपरा से प्राप्त हुई है। अनुश्रुति है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी छेनी-टाँकी से मनुष्य का भाग्य उसके भालपट्ट पर गूढ़ लिपि में ही लिखते हैं और उसका हिसाब भगवान चित्रगुप्त रखते हैं। 'चित्रगुप्त' नाम भी अपने आप में रहस्यमय है। दीपावली में भगवान चित्रगुप्त की भी पूजा होती है। संभवतः चित्राक्षर (Pictograph) लिखने की इस परंपरा के कारण ही उनका नाम चित्रगुप्त हुआ है। वैदिक गणित में भी किसी एक शब्द या पूरे वाक्य के लिए संकेत-चिन्ह मिलते हैं। हमारे यहाँ चूँकि, इसलिए, ओम, पाई, समानांतर, समरूप, समानुपात,से बड़ा,से छोटा(>,<), वर्गमूल, अनुपात बीटा, गामा, ठीटा आदि का प्रयोग चित्राक्षर के रूप में होता ही है। ज्यामिति में भी इस तरह के चिन्हों की भरमार है और यातायात में तो आज भी हम एक पूरे विचार के लिए एक शब्द या एक संकेत का उपयोग करते हैं। हड़प्पा-लिपि में भी ऐसे संकेत-चिन्हों की बहुलता मिलती है। नए शोध से पता लगा है कि ब्राम्ही-लिपि भी संभवत: हड़प्पा-लिपि से ही उद्भूत हुई है। यह भी संभव है कि हड़प्पा-लिपि संस्कृत का भी कोई प्राचीनतम रूप हो! इस प्रकार हमारी छोटी-छोटी परंपराएँ कितनी अर्थगर्भित हैं और एक छोटी-सी बात का दूसरा छोर कितनी दूर तक पहुँचता है यह भी विचार करने की बात है।