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झारखण्ड राज्य के जिला बोकारो प्रखंड जरीडीह से शिवनारायण मोबाइल वाणी के माध्यम से पलायन कर वापिस लौट चुके मजदूर ओमप्रकाश महतो से बात-चीत करते हुए। ओमप्रकाश महतो बताते है कि वे बैंगलोर में काम किया करते थे एवं वहाँ सभी सुविधाएं उपलब्ध होती थी। वे बताते है कि पलायन का मुख्य कारण है अपने राज्य में काम उपलब्ध नहीं होना। साथ ही वे बताते है कि पलायन कर के दूसरे राज्य में काम करते है तो परिवार वालो को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। क्यूंकि वेतन समय से नहीं मिलने पर समय से घर वालो को पैसा भेज भी नहीं पाते है जिस कारण घर वालो के सामने खाने की भी परेशानियां खड़ी हो जाती है।

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झारखण्ड से मज़दूरों के पलायन का एक लम्बा इतिहास रहा है, और पिछले कुछ दशकों में इसकी गति में और भी तेज़ी आई है. ग्रामीण इलाको के ग़ैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध नहीं होना और इसके साथ-साथ देश के दूसरे हिस्सों में मज़दूरों की भारी मांग ने राज्य से मज़दूरों के पलायन को और भी तेज़ किया है। और इसी के साथ उन मज़दूरों के साथ दुर्घटनाएं भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ी है। दोस्तों ,इस बार जनता की रिपोर्ट में भी हमनें यही बात की है कि झारखंड के प्रवासी श्रमिकों की मौत के बाद उजड़े परिवार, और इसके लिए जिम्मेदार कौन? तो आइए सुनते हैं आपने कुछ लोगों की राय जानी कि उन्हें किस तरह हालात का सामना करना पड़ रहा है। अब आप हमें बताएं कि पलायन करने वाले मजदूरों के परिवार किस तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं? यदि उनके साथ कोई हादसा हो जाता है तो क्या कंपनी के मालिक कोई मदद करते हैं? क्या स्थानीय प्रशासन ने उनकी सहूलियतों के लिए कभी कोई प्रयास किया?

रोजगार की तलाश में अपना घर, गांव और कस्बा छोड़कर किसी और राज्य में जाना अब लगभग आम सा हो गया है. हम अपने आसपास रोजाना ही ऐसे जाने कितने परिवारों से मिलते हैं, जिनका कोई अपना रोजगार की तलाश में दूर किसी महानगर में है और पीछे उसका परिवार राह तांक रहा है. दिहाड़ी मजदूरों की दयनीय दशा को देखकर केंद्र सरकार ने 1979 में इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन कानून बनाया था. जिसके अनुसार हर कारखाने के मालिक या खेतों के मालिक को आदेश दिया गया कि वह अपने यहां काम करने वाले मजदूरों का पंजीयन करे. उन्हें पहचान पत्र दें और उनके रहने का उचित प्रबंध करे और जरूरत पडने पर स्वास्थ्य सुविधाएं भी मुहैया करवाएं. लेकिन यह कानून किताबी जुमला बनकर रह गया. किसी ने भी इस आदेश को गंभीरता से नहीं लिया और यही कारण है कि कंपनियों के पास मजदूरों के स्थायी पते, नम्बर आदि भी नहीं हैं. कई बार ऐसा होता है कि काम के दौरान कोई हादसा होता है और मजदूर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं. कई बार तो उनकी मौत तक हो जाती है लेकिन परिवार वालों को समय पर खबर नहीं हो पाती. दोस्तों, चुनावी मौसम में एक बार फिर पलायन और रोजगार का मुद्दा उठाया जा रहा है लेकिन उन परिवारों की दिक्कतों का क्या, जो मजदूर के चले जाने के बाद उसका परिवार झेलता है? तो हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या आपने अपने आसपास किसी मजदूर के परिवार को ऐसी परेशानियों का सामना करते देखा है? पलायन करने वाले मजदूरों के परिवार किस तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं? यदि उनके साथ कोई हादसा हो जाता है तो क्या कंपनी के मालिक कोई मदद करते हैं? क्या स्थानीय प्रशासन ने उनकी सहूलियतों के लिए कभी कोई प्रयास किया?