एक दौर था जब कुम्हार दिपावली का बेसब्री से इंतजार करते थे। उस समय मिट्टी से बने दियों की बहुत मांग रहती थी और बाजारों में इनके खरीदारों की भीड़ नजर आती थी। मगर अब बदलते दौर के साथ इन मिट्टी के दियों और बर्तनों को बनाने वाले कुम्हार इक्का-दुक्का ही नजर आते हैं।आज कुम्हार की चाक और मिट्टी अपना ही वजूद तलाश रही है। कड़ी मेहनत से मिट्टी के दिये और बर्तन बनाने वाले कुम्हारों को आज खरीददार नहीं मिल रहे हैं। आखिर क्यों समाज में आज कुम्हारों की संख्या में कमी नजर आ रही है...? कुम्हार हमेशा से पर्यावरण को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं और इसिलिए मिट्टी को ही चाक पर अलग-अलग रूप देते हैं। पर आजके वर्तमान समय में त्यौहारों में लोग मिटटी के दिए की जगह चाइनीज बल्बों के लाईट का इस्तेमाल करते नजर आते हैं। आपके अनुसार इसके पीछे के मुख्य वजह क्या हो सकता है....? दोस्तों, आपके क्षेत्र में कुम्हारों की वर्तमान स्थिति कैसी है...? उन्हें किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है..? कुम्हारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आए इसके लिए शासन कई योजना बनाकर उनकी आर्थिक स्थिति को ऊंचा बनाने का प्रयास करती है। पर क्या कुम्हारों को उन योजनाओं का लाभ आसानी से मिल पता है...? यदि हाँ तो कैसे और यदि नहीं तो क्यों नहीं...? शासन को और कौन-कौन से कदम उठाने की आवश्यकता है..? जिससे कुम्हारों को हर योजनाओं की जानकारी और लाभ आसानी से मिल सके। क्या आपके समुदाय में बुजुर्ग कुम्हार आज की नई पीढ़ी को मिटटी की चाक की अहमियत के बारे में बताते हैं...? इससे सम्बंधित अपने क्षेत्र की स्थिति,कोई राय ,प्रतिक्रिया या फिर सुझाव है ,तो हमारे साथ जरूर बाटे नंबर 3 दबाकर। आपके द्वारा रिकॉर्ड कराये कुछ बेहतरीन प्रतिक्रियों को पंचायतनामा के आने वाले अंक में प्रकाशित किया जायेगा।
