जिले में सरकारी एम्बुलेन्स की कमी के कारण निजी एम्बुलेंस की संख्या काफी बढ़ती जा रही है । इससे मरीज इन निजी एम्बुलेन्स के शोषण का शिकार हो रहे हैं। निजी एम्बुलेन्स का किराया सरकारी स्तर पर तय नहीं होने के कारण मरीजों का काफी दोहन शोषण हो रहा है। मिली जानकारी के अनुसार जिले में 78 एम्बुलेन्स का संचालन हो रहा है। जिसमें 24 एम्बुलेन्स धक्का मार है। किसी एंबुलेंस का सेल्फ खराब है तो किसी का बैटरी कमजोर है तो किसी का चक्का कमज़ोर है। न तो फिटनेस है और न पर्यावरण से प्रमाण पत्र। बस सरकारी स्तर पर एंबुलेंस चल रहा है। बताया जाता है कि जिले की आबादी करीब 65 लाख है। 60 हजार की आबादी पर क एम्बुलेन्स होना चाहिये। मगर यहां तो 65 लाख की आबादी पर मात्र 78 सरकारी एम्बुलेन्स है। जबकि जिला में 27 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ,6 अनुमंडल , 12 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के अलावा 112 अतरिक्त स्वस्घ्य केंद्र है। इसके अलावा सदर अस्पताल है। इसके अलावा प्रोटिकॉल के लिये कम से कम 6 एम्बुलेन्स की जरूरत है। इसकी कमी के कारण जिला में निजी एम्बुलेन्स की बाढ़ आ गयी है। हर 10 मिनट पर निजी एम्बुलेन्स का सायरन शहर के सभी ओर जाने वाली मुख्य मार्ग पर बजता है। कभी कभी तो सरकार महामारी के समय निजी एम्बुलेन्स को हायर करने का निर्देश भी देती है। जानकार बताते हैं जिला से सरकार से वेंट वाली और एम्बुलेन्स की मांग भी की गयी है। क्योंकि वेंटिलेटर वाले एम्बुलेन्स की ही डिमांड है व डाक्टर भी वेंटिलेटर वाले एंबुलेंस से ही मरीज के लिये रेफर करते हैं। बताया जाता है जिला अस्पताल से हर रोज चार से पांच मरीज रेफर होते हैं। 102 नम्बर के एक एम्बुलेन्स ड्राइवर ने बताया कि जिले में एनजीओ के माध्यम से करीब दो दर्जन एम्बुलेन्स को चलाना खतरे से खाली नहीं है।