झांसी के विकासखंड चिरगांव में डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स और उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UPSRLM) के सहयोग से उद्यमी मेले का आयोजन किया गया। मेले में ब्लॉक और जिले के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। खास आकर्षण वे महिला उद्यमी रहीं, जो अपने-अपने उत्पाद लेकर मेले में पहुंचीं और उन्हें बाजार से जोड़ने की दिशा में प्रयास किया। डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स की ब्लॉक फील्ड कोऑर्डिनेटर नेहा पांडे के अनुसार, कार्यक्रम में लगभग 200 से 250 महिलाओं ने हिस्सा लिया। महिलाओं ने अपने उत्पादों को स्टॉल पर प्रदर्शित किया और उन्हें ग्राहकों तक पहुंचाने तथा स्थानीय स्तर पर बाजार विकसित करने की संभावनाओं पर जानकारी साझा की। कार्यक्रम में यूपीएसआरएलएम को लीड कर रहे सुनील कुमार मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने महिला उद्यमियों के प्रयासों की सराहना की और उनके काम को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मंच से झांसी मोबाइल वाणी और अनिसुर रहमान का नाम लेते हुए डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के साथ मिलकर ग्रामीण समुदायों के बीच जागरूकता फैलाने में उनके योगदान की सराहना की। मेले में झांसी मोबाइल वाणी की टीम ने भी अपना स्टॉल लगाया। यहां पहुंचने वाली महिलाओं से उनके व्यवसाय, उत्पादों और बिजनेस आइडिया के बारे में बातचीत की गई और कई महिलाओं के बिजनेस आइडिया रिकॉर्ड किए गए। इसका उद्देश्य महिलाओं की उद्यमशीलता की कहानियों और उनके अनुभवों को व्यापक स्तर पर सामने लाना था। इसके अलावा झांसी मोबाइल वाणी की टीम ने कार्यक्रम के दौरान पांच इंटरव्यू भी रिकॉर्ड किए। इनमें प्रोजेक्ट के पार्टनर्स, टीम से जुड़े सदस्यों और परियोजना से लाभान्वित हो रही महिलाओं के अनुभव शामिल रहे। इन बातचीत के माध्यम से यह समझने की कोशिश की गई कि परियोजना ने महिलाओं को अपने व्यवसाय शुरू करने और आगे बढ़ाने में किस तरह सहयोग दिया है। उद्यमी मेला न केवल महिला उद्यमियों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का मंच बना, बल्कि उन्हें बाजार, पहचान और नए अवसरों से जोड़ने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। मेले में महिलाओं की भागीदारी ने यह दिखाया कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अपने हुनर और छोटे-छोटे व्यवसायों के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही हैं।
झांसी जिले के चिरगांव ब्लॉक से महिलाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है।झांसी मोबाइल वाणी टीम के कई दिनों के लगातार प्रयासों के बाद आज आईआरसीटीसी, झांसी के अधिकारी श्री अनुराग जी ने चिरगांव ब्लॉक के धमना खुर्द गांव का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने गांव की कई महिलाओं का पंजीकरण किया।
आज की युवा पीढ़ी महिला अधिकारों को एक नए नजरिए से देख रही है। जहां पहले अधिकारों की लड़ाई सड़क से संसद तक सीमित थी, वहीं अब यह लड़ाई डिजिटल दुनिया तक पहुंच चुकी है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल कैंपेन यह सब उसके नए हथियार हैं.
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भारत में खेती से जुड़ें कामों में महिलाओं की भागीदारी 70% के लगभग है जबकि वास्तिविकता में यह 15 प्रतिशत के करीब आती है सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 30% महिलाओं को ही “किसान” के तौर पर जाना जाता है. यह भारत में कामकाजी महिलाओं का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा खेती और उससे जुड़े कार्यों में लगा हुआ है.
कल के नेता, आज की आवाज़” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक आह्वान है—युवाओं के लिए, समाज के लिए और नीति निर्माताओं के लिए। यदि युवाओं को सही दिशा, प्रशिक्षण और अवसर दिए जाएं, तो वे भूमि न्याय के आंदोलन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं। भविष्य का भारत तभी सशक्त और न्यायपूर्ण होगा, जब आज की युवा आवाज़ भूमि पर समान अधिकार की मांग को मजबूती से उठाएगी। तब तक आप हमें बताइए कि , *--- आपके परिवार में जमीन किसके नाम है? क्या महिलाओं का नाम भी उसमें शामिल है *--- “हम अपने परिवार और समाज में ऐसी कौन-सी पहल कर सकते हैं, जिससे महिलाओं को ज़मीन में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित हो? *--- “अगर महिलाओं के नाम जमीन हो जाए, तो आपके हिसाब से उनकी ज़िंदगी में क्या-क्या बदल सकता है?”
परंपरा तभी बदलेगी, जब सोच बदलेगी। जब समाज यह समझेगा कि महिलाओं को भूमि और संपत्ति में समान अधिकार देना परिवार और राष्ट्र दोनों के हित में है, तभी भारत वास्तविक अर्थों में समानता और न्याय की दिशा में आगे बढ़ेगा। तब तक आप हमें बताइए कि , *---- आपके परिवार में जमीन किसके नाम है? क्या महिलाओं का नाम भी उसमें शामिल है *---- हम अपने परिवार और समाज में ऐसी कौन-सी पहल कर सकते हैं, जिससे महिलाओं को ज़मीन में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित हो? *---- अगर महिलाओं के नाम जमीन हो जाए, तो आपके हिसाब से उनकी ज़िंदगी में क्या-क्या बदल सकता है?”
क्या आपके गाँव या मोहल्ले में किसी महिला ने अपने नाम पर जमीन या घर के कागज़ बनवाने की कोशिश की है? क्या उसका जीवन बदला? क्या परिवार का व्यवहार बदला? क्या बेटियों और बहुओं का नाम जमीन और घर के कागज़ में होना चाहिए? कैसे परिवार मजबूत होगा? आपकी राय भले ही पक्ष में हो विपक्ष में अपनी राय जरूर रिकार्ड करें। राय रिकॉर्ड करने के लिए अपने फोन से 3 नंबर का बटन दबाएँ या मोबाइल वाणी ऐप में लाल बटन दबाकर अपनी बात रिकॉर्ड करें।
दोस्तों, महिलाओं के भूमि अधिकार सुरक्षित करने में स्थानीय शासन की भूमिका केंद्रीय है। यदि ग्राम पंचायतें भूमि अधिकार को प्राथमिकता दें, महिलाओं को लाभार्थी सूचियों में शामिल करें, अधिकारियों को प्रशिक्षण दें और समुदाय संगठनों के साथ मिलकर काम करें, तो ग्रामीण भारत में महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण संभव है। स्पष्ट है कि जमीन पर अधिकार सिर्फ कागज़ी नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता का सवाल है — और इसका समाधान गांव से ही शुरू होगा। तब तक आप हमें बताइए कि , *--- आपके परिवार में जमीन किसके नाम है? क्या महिलाओं का नाम भी उसमें शामिल है *--- क्या आपकी पंचायत ने कभी महिलाओं को जमीन के अधिकार के बारे में कोई जानकारी या बैठक रखी है? अगर हाँ, तो उसका असर क्या रहा?” *--- अगर महिलाओं के नाम जमीन हो जाए, तो आपके हिसाब से उनकी ज़िंदगी में क्या-क्या बदल सकता है?”
उत्तरप्रदेश राज्य के झाँसी ज़िला के ग्राम बनुवा से विकेश प्रजापति मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि 'साझा हक़, मज़बूत परिवार: महिलाओं के अधिकार से पीढ़ियों तक बराबरी” कार्यक्रम अच्छा लगा। यह सत्य है कि सब को सामान दर्ज़ा देना चाहिए।जब हम शुरुआत घर से करेंगे तब ही आगे चल कर देश समाज में बदलाव देख सकते है
