सोनपुर शारदीय नवरात्र रविवार से आरंभ हो गया है। सोनपुर प्रखंड क्षेत्र के नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में भक्ति मय माहौल हो गया। प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा अर्चना की गई। सभी जगह पर मां दुर्गा के भक्ति गीत सभी जगह गूंज रहे हैं । माँ के पूजन कलश स्थापना से शुरू होकर इन 8 दिनों में माता के अलग- अलग स्वरूपों की पूजा- अर्चना की जाती है। साथ ही नवरात्रि के दौरान लोग पूरे 9 दिनों तक व्रत भी रहते हैं। नवरात्रि के 9 दिन मां के भक्तों के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं इसलिए पुराणों में देवी मां की पूजा के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करने से माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जो भक्त नवरात्रि के पूरे नौ दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है उसे सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। नवरात्रि में मां अपने भक्तों के कल्याण के लिए धरती पर आती हैं। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से किसी भी तरह प्रकार के अनिष्ट का नाश हो जाता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। दुर्गा सप्तशती सब तरह की चिंताओं, क्लेश, शत्रु बाधा से मुक्ति दिलाती है । लेकिन इसके शुभ फल प्राप्त करने के लिए इसका पाठ सही तरीके से करना बहुत जरूरी है। प्रथम दिन सिंह वाहिनी शक्ति स्वरूपा माँ भगवती दुर्गा हाथी की सवारी करती हुई पृथ्वी लोक पर पहुँची । साल में चार बार पौष, चैत्र, आषाढ़ और अश्विन महीने में नवरात्र आते हैं। उपर्युक्त बातें हरिहर क्षेत्र पीठाधीश्वर जगद्गुरुरामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य जी महाराज ने श्री गजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् नौलखा मन्दिर में कलश स्थापना दिवस पर बताया। उन्होंने यह भी कहा कि चैत्र और आश्विन में आने वाले नवरात्र प्रमुख होते हैं, जबकि अन्य दो महीने पौष और आषाढ़ में आने वाले नवरात्र गुप्त नवरात्रि के रूप में मनाए जाते हैं। वहीं आश्विन महीने से शरद ऋतु की शुरुआत होने लगती है, इसलिए आश्विन महीने के इन नवरात्र को शारदीय नवरात्र के नामसे जाना जाता है। ये नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र 15 अक्टूबर से शुरू हो कर 23 अक्टूबर तक चलेंगे। नवरात्रि के पहले दिन देवी मां के निमित्त कलश स्थापना की जाती है।नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना से पूर्व पूजा पंडाल व घरों में माता रानी के आगमन को लेकर भक्तों में उत्साह बना रहा । नौलखा मन्दिर के प्रबंधक नन्द कुमार बाबा ने बताया कि पवित्र गंगा व नारायणी नदी के जल से वरूण सहित अन्य देवी देवताओं का आवाहन कर जौ भूमि पर रखकर कलश के मुख पर कलावा बांधकर और एक मिट्टी की कटोरी से कलश को ढककर चावल भर ,एक जटा वाला नारियल लेकर उसे लाल कपड़े में लपेटकर, ऊपर कलावे से बांधकर चावल से भरी हुई कटोरी के ऊपर स्थापित किया जाता है। उन्होंने आगे बताया कि कुछ लोग कलश के ऊपर रखी गई कटोरी में ही घी का दीपक जला लेते हैं। ऐसा करना उचित नहीं है। कलश के ऊपर दीपक नहीं जलाना चाहिए। दूसरी बात ये है कि कुछ लोग कलश के ऊपर रखी कटोरी में चावल भरकर उसके ऊपर शंख स्थापित करते हैं। इसमें कोई परेशानी नहीं है, आप ऐसा कर सकते हैं। बशर्ते कि शंख दक्षिणावर्त होना चाहिए और उसका मुंह ऊपर की ओर और चोंच अपनी ओर करके रखें। इस सारी कार्यविधि में एक चीज का विशेष ध्यान रखें कि ये सब करते समय नवार्ण मंत्र अवश्य पढ़ें। नवार्ण मंत्र है- 'ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे।' इस बार महानवमी, विजयादशमी दोनों 23 अक्टूबर को हीं है। श्रवण नक्षत्र और दशमी तिथि का योग में ही विजय यात्रा, दुर्गा विसर्जन, सीमोलघंनम्, नीलकंठ दर्शन, शमी पूजन, जयंती ग्रहणम् एवं विजयादशमी पर्व मनाया जाता है। वहीं ज्योतिषाचार्य नन्द किशोर तिवारी ने बताया कि "अपराह्नव्यापिनि श्रवणयोगवती इयमेव विजयादशमी। सा च द्वितीय दिने श्रवण योगाभावे पूर्वा ग्राह्या।"अतः सोमवार 23 अक्टूबर को हीं विजयादशमी है। पारणा के लिए दशमी तिथि का विधान है जो सोमवार शाम से मंगलवार साढ़े बारह बजे तक है।
