वर्तमान झारखण्ड प्रांत के मनोरम वादियाँ और पर्वत श्रृंख्लाओं से सुशोभित चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल माता कौलेश्वरी के सानिध्य मे स्थित तेतरिया ग्राम मे बाबू राम नारायण सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1885 ई. को हुआ था। इनके पिता का नाम भोली सिंह था जो आर्थिक रूप से विपन्न किसान थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय जोरी मिडिल वर्नाकुलर स्कूल से हुई तत्पश्चात हजारीबाग जिला स्कूल से सन 1908 में उन्होंने एंट्रेंस की परीक्षा पास की। वे बचपन से ही मेधावी थे पिता की दयनीय आर्थिक स्थिति इन की शिक्षा दीक्षा में बहुत बड़ा अवरोध थी परंतु परिवार के लोगों ने इनके बुलंद हौसले और लगन को देखते हुए इनकी पढ़ाई जारी रखने का निर्णय लिया। चुंकी उस समय बंगाल बिहार और उड़ीसा प्रांत के लिए एक ही विश्वविद्यालय कोलकाता में था अतः उच्च शिक्षा के लिए उन्हें कोलकाता जाना पड़ा । वहाँ रिपन कॉलेज से सन 1913 में उन्होंने बी ए की परीक्षा पास की उसी समय वे डॉ राजेंद्र प्रसाद के संपर्क में आए और उनसे समाज सेवा की प्रेरणा मिली। सन 1914 ई. में वे असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर के पद पर नियुक्त हुए मगर मात्र दो ही वर्षों में नौकरी से उनका मोहभंग हो गया उन्होंने सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया। नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद 1916 ई• में उन्होंने पटना लॉ कॉलेज में नामांकन लिया सन 1919 ईस्वी में उनकी पढ़ाई पूरी हुई इसके बाद उन्होंने 1920 में पटना में वकालत शुरू की दो-तीन माह के बाद ही वहां से चतरा आ गए तथा वकालत शुरू की अल्पावधि में ही वकालत में उन्होंने काफी नाम कमाया लेकिन देश सेवा के प्रति लगन ने पुनः उन्हें वकालत छोड़ने को बाध्य कर दिया वह पूर्ण स्वराजी बनकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। रामनारायण बाबू स्वतंत्रता आंदोलन में इतने सक्रिय रहे कि इन्हें 8 बार जेल जाना पड़ा जहां इनके जीवन के 10 से अधिक वर्ष व्यतीत हो गए सत्याग्रह आंदोलन 1920 से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के वर्ष 1947 ईसवी तक देश की आजादी उनका प्रमुख ध्येय रहा। अपनी लगन मेहनत कर्मठता एवं लोकप्रियता के कारण 1927 ई.से 1946 ई•तक वे लगातार केंद्रीय विधानसभा के लिए निर्वाचित होते रहे। रामनारायण बाबू के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि वह अपनी बातों को कहीं भी बड़े निर्भीक एवं दमदार तरीके से रखते थे उनके वक्तव्य से प्रभावित होकर लोग उनके समर्थक बन जाते थे यही कारण था कि जेल में भी अंग्रेज सरकार की उन पर कड़ी नजर रहती थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1934 में बिहार मे आए विनाशकारी भूकंप के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद सहित सभी आंदोलनकारियों को जेल से छोड़ दिया गया था परंतु बाबू राम नारायण सिंह को जेल में रखा गया कारावास के दौरान ही उनके दो पुत्रों का देहांत हो गया। ऐसी दुखद घटना के बाद भी वह देश सेवा के मार्ग से विचलित नहीं हुए। सन 1946 ईस्वी में जब संविधान सभा का गठन हुआ तो बाबू रामनारायण सिंह को भी उसका एक सदस्य बनाया गया वहां उन्होंने पंचायती राज व्यवस्था के संबंध में तथ्य पूर्ण ढंग से अपनी बातों को रखा था। सादगी पूर्ण जीवन शैली वाले बाबू राम नारायण सिंह न केवल स्वतंत्रता बल्कि सामाजिक सुधारो के प्रति भी सचेत रहते थे हजारीबाग जिला परिषद उपाध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने अपनी सराहनीय भूमिका निभाई थी "छोटा नागपुर का शेर" नाम से विख्यात इस महान हस्ती ने 24 जून 1964 ई को सदा के लिए अपनी आंखें मूँद लीं। हंटरगंज के हाईस्कूल और काॅलेज का नाम उन्हीं के नाम से नामांकित किया गया है।
