सरहदों का दायरा बढ़ता जा रहा है अंतर्राष्ट्रीय सरहदों से मुल्क भले ही महफूज़ हो, लेकिन इन दिनों अपने ही मुल्क के किसानों को, अपने ही मुल्क की राजधानी में आने के लिए सरहदों का सामना करना पड़ रहा है। अपने ही मुल्क में सरहदें बनाने और इंटरनेट बंद करने वालीं कंपनियों की सरकारें सड़कों को सरहदों में तब्दील करने में लगी हुई है जहाँ प्रजातंत्र के नाम पर कंपनियों की सरकारों ने सड़कों पर कीलें और कटीले तार बिछा रखे हैं। प्रजातंत्र के इस खेल में मजदूरों को जनता बनाने के लिए इस उस कम्पनियों की सरकारों का खेल चल रहा है और जनता अब जनार्दन लगने लगी है मज़दूर कंपनियों में खपने को मजबूर होता जा रहा है, मज़दूर जनता है कि नहीं यह सवाल भी अधूरा ही रह गया है।
